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Showing posts from August, 2018
---पोथी -परख--- शाज़ी ज़मां की किताब 'अकबर' की समीक्षा.... अकबर के जीवन को इतिहास में जितना लिखा गया उतना ही साहित्य,संगीत, और दीन के मसलों में भी लिखा गया।अकबर अपने साथ एक साम्राज्य लेकर नहीं चल रहा था अकबर अपने साथ में इंसानियत और संजीदगी लेकर चल रहा था,जिसने दिल्ली,आगरा और फ़तहपुर सीकरी के दरवाज़ों को संतो,फ़कीरों,पादरी लोगों के लिए खोल रखा था।शाज़ी ज़मां का अकबर इतिहास के अकबर से अलग है, इतिहास का अकबर युद्धों और साम्राज्य विस्तार वाला व कूटनीतिक अकबर है,जबकि शाज़ी ज़मां का अकबर हरेक दीन (धर्म)की क़द्र करने वाला,संतों फ़कीरों व पादरियों की चर्चाएँ सुनने वाला,अपने दरबारियों से मित्रता रखने वाला,मित्रों की मौत पर होश खोकर आँखें बहाने वाला,पूरे कुनबे को संरक्षण देने वाला,गुस्से में भरे दरबार में गुनाहगार को गाली देने वाला,हरेक धर्म की अच्छाईयों पर तारीफ़ें पढ़ने वाला,बेझिझक होकर उन्हें अपनाने वाला,और अनेकों गुनाहगारों को क्षमा करने वाला अकबर है।शाज़ी ज़मां ने उपन्यास का स्वरूप देकर पाठकों को एक इतिहास के सदी चक्र को बड़े ही सुंदर ढ़ंग से पेश किया है,भेरा (पंजाब) में अकबर के सैनिक शिका...
कहानी----"मोणीगर रहो नी आज री रात" अब बरसाले के दिनों में रेत नहीं उङती। दखिणी पवनें शांत और सलील लहराते बाजरी के खेतों में सरसराहट की थपकी घोल कर कृषक के पृष्ठभाग की मालिश करते हुए अगले खेत की बाजरी को घुमेरा देकर चली जाती। मीनल का पति चेतन उससे कोसों दूर अधियारे खेत में डेरा डाले हुए था। अच्छी फसल की आश में पहले सूङ फिर बारिश का इंतज़ार और फिर बुवाई व रखवाली के दिन।  सावन की तीज पर मीनल को आश थी कि चेतन आएगा और इसी आशा को सुंदर बनाने के लिए मीनल ने स्वयं को सजाने की तमाम विधियों को अपना बना लिया, घर के खेत में सूङ करने से उसके शरीर पर लगे केर के कांटों के निशां उसने हल्दी से धो दिए।मेट से नरम किए रेशमी बालों को सास  माँ से गुंथाया। काजल की लकीरों से आँखों की शिल्पता को और बढ़ा दिया। विवाह की पोशाक में इत्र लगाकर उसे सिणगार में शामिल किया। नथ के बांकेपन को ठीक करके आईने में थोड़ी देर के लिए ताकती रही। उसे याद आया कि बिंदी तो भूल ही गई, सिणगार संदूक की तरफ लपककर लाल बिंदी को भाल के मध्य सजा दिया, बिंदी में पङा चमकीला निशां आईने से टकराकर उसके मुख पर पड़ने लगा और पुनः उ...
कहानी---"इश्क़ है दरिया जादू का"...... नेशनल हैंडलूम की सीढ़ियों पर विश्वजीत को वो दिखाई दिया जिसे उसकी आँखें हरेक आती जाती स्कूली ड्रेस में देखा करती थी। पर यह स्कूल ड्रेस नहीं थी यह केशर वरणी चुनरी ओढे उसकी निहारिका थी। "न.. नि... निहारिका ओ निहारिका ओ निहारिका....सीढियों के तले से निहारिका ने ऊपर देखा और पहली निगाह में ही पहचान लिया उसे। वह दौङकर उससे लिपटना चाहती थी पर हैंडलूम में कौतूहल होने के डर से वह मुस्कान बिखेर कर खङी रही। विश्वजीत सीढ़ियों से दौङकर उसके पास आकर कुछ कहने ही वाला था कि निहारिका ने उसे खींचकर आइस्क्रीम कार्नर की बगल में ले जाकर उसे अपने नंबर साझा किए और कैफे में मिलने का कहकर चल दी। निहारिका तुमने तीन दिन बिता दिए आने का कहकर पर आज भी तुम नहीं आई मैं पूरा दिन माॅम्स कैफे में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ। अरे विभू मैं आज नहीं आऊंगी सो सोरी विभू, हम अगले हफ्ते मिलेंगे। कहकर निहारिका ने फोन काट दिया। रेगिस्तां की पहाड़ियों के बीच एक शहर जो लू की लपटों को सहकर बङा हुआ है, विकास नाम के बैल से कई बार मार खाई, लेकिन संभलकर चलने का हुनर इसके कुछ अक्लमं...
कहानी----"जानकी से मोनालिसा तक" ..उसके चेहरे पर खरोंचों के दाग आज बीस दिन बाद उसने देखे थे, अस्पताल के ही शिशे में।होश भी आज ही आया था ,उसे नहीं पता कि दो बार कौमा में मौत उसके सर पर हाथ फेरकर लौरी सुना गई थी।मासूमियत उसके पोरों से रिसकर बड़े अस्पताली लिबास को भिगो रही थी, बाहर माँ गूसलखाने का दरवाज़ा रह रहकर बजा कर कह रही थी"बेटू बाहर आ रंजन के पिता आज जोधपुर से नया वकील लेकर आए हैं ।" मोनालिसा के आंसू आँखों के भींचने से और तेज हो गए ,हाथों की अंगुलियों को कसकर सर के दोनों तरफ़ पकड़कर फफकती रही।                    बाहर के शोरगुल से बेख़बर वह अपने भीतर चल रहे शोरगुल को रोक नहीं पा रही थी।घुटनों के बल बैठकर बालों को संवारने की नाकाम कोशिश की पर वे फिर बिखर गए।वह दीवार के सहारे चलकर खड़ी हुई तब तक बाहर का शोरगुल हो हल्ले में बदल गया,उसने आंसुओं को पोंछा और अंतर की फफकन को मुंह से लम्बी आहें भरकर कम किया और सहमी सी बाहर आकर माँ के पीछे खड़ी हो गई,बाहर पिताजी ने वकील को कुर्सी पर बिठाकर मोनालिसा को भी बिठा दिया,मोनालिसा का हाथ उसकी माँ ने थाम ...