कहानी----"मोणीगर रहो नी आज री रात"
अब बरसाले के दिनों में रेत नहीं उङती। दखिणी पवनें शांत और सलील लहराते बाजरी के खेतों में सरसराहट की थपकी घोल कर कृषक के पृष्ठभाग की मालिश करते हुए अगले खेत की बाजरी को घुमेरा देकर चली जाती। मीनल का पति चेतन उससे कोसों दूर अधियारे खेत में डेरा डाले हुए था। अच्छी फसल की आश में पहले सूङ फिर बारिश का इंतज़ार और फिर बुवाई व रखवाली के दिन।
सावन की तीज पर मीनल को आश थी कि चेतन आएगा और इसी आशा को सुंदर बनाने के लिए मीनल ने स्वयं को सजाने की तमाम विधियों को अपना बना लिया, घर के खेत में सूङ करने से उसके शरीर पर लगे केर के कांटों के निशां उसने हल्दी से धो दिए।मेट से नरम किए रेशमी बालों को सास माँ से गुंथाया। काजल की लकीरों से आँखों की शिल्पता को और बढ़ा दिया। विवाह की पोशाक में इत्र लगाकर उसे सिणगार में शामिल किया। नथ के बांकेपन को ठीक करके आईने में थोड़ी देर के लिए ताकती रही। उसे याद आया कि बिंदी तो भूल ही गई, सिणगार संदूक की तरफ लपककर लाल बिंदी को भाल के मध्य सजा दिया, बिंदी में पङा चमकीला निशां आईने से टकराकर उसके मुख पर पड़ने लगा और पुनः उसका निशां आईने में पङा, मीनल यह देखकर मुस्कान बिखेर गई और आईने ने स्वयं को धन्य माना और मीनल ने स्वयं को।
लेकिन अभागों की रातें भी अंधेरी होती है और दिन भी काले। चेतन तीज के दिन घर नहीं आया। मीनल का सिणगार आंसू लेकर दीवार के पीछे साङी को चेहरे से आधा उठाए चेतन का रास्ता तकता रहा। चेतन के ना आने का क्रोध बाजरी की रोटी के थपकों पर निकाला। चेतन घर से दूर तीज त्योहारों से बेखबर जंगली सुअरों से खेत की सुरक्षा करता रहा। आसाढ की बोई बाजरी अच्छी फसल दे जाती है और इन्हीं दंतकथा अनुमानों से वह स्वयं को आश्वस्त करता रहा।
धोरे की तलहटी के दोनों ओर खेजङी के झुरमुट की छांव में यह अधियारा खेत जुगतिंग का था। चेतन इन्हीं घनी छांव वाली बङी खेजङी के नीचे डेरा देकर बैठा था। एक बकरी भी चाय के लिए वह जुगतिंग से माँग लाया था, बकरी को जगह दर जगह बाँधने से उसके निशां अखङ में स्पष्ट नज़र आते थे। मीनल और चेतन का विवाह बीती सर्दियों में हुआ व हरेक बुरे साये से दूर रहा लेकिन जीवटता की रेत कभी चेतन को घर से अलग करती तो कभी मीनल को पीहर भेज देती। सुख की रातें व स्नेह के दिन दोनों ने बहुत कम साथ गुजारे थे। प्रकृति का नियम ही ऐसा होता है कि स्नेहिलताएं अपने साथ में वियोग रस की तूलिका लेकर आती हैं और जीवन भर स्नेहिल पात्रों के दिलों में बिछुङन के श्राप उस वियोग की तूलिका से लिखवाती रहती है। आसू मास को उजला मास कहा जाता है, इन दिनों कालियाण कांठलें व बरखा बादल कहीं दूर चले जाते हैं, हवाएं पुनः बाजरी के खेतों में घुमेरे लेती हुई नगरवधु के घुंघरूओं के समान अनेक खेतों में खनकती रहती थी। तपती दोपहरी में धान पकते थे, छांग के ग्वाले कूकारियों से डेर गूँजा देते थे। गोवंश धोरों के नालों में उतरता रंभाता डूबते सूरज को गोधूलि रजकणों से ढांप देता था। रातें ना तो अधिक तपती ना अधिक शीतल होती थी।
चेतन ने बकरी को संभालकर उसके बच्चे को अपनी चारपाई के पागे पर बाँध दिया, स्वयं के अस्थायी डेरे में जुगतिंग के घर से आए मतीरे के साग से सुबह की बचाई रोटियाँ गर्म कर खाने लगा। देखा कि बकरी जोर जोर से अचानक चिल्लाने लगी, हाँ वह रस्सी से उलझ गई थी, बकरी के चिल्लाने की आवाज़ का प्रत्युत्तर उसका बच्चा दे रहा था चारपाई से बंधी रस्सी को खींच खींच कर स्वयं को छुङाने की नाकाम कोशिश करके अपनी माँ के पास जाना चाहता था। चेतन ने बकरी की रस्सी को सुलझा दिया। पुनः रोटी के निवाले लेने लगा। इतने में खेजङी के ऊपर चिड़ियों का शोर सुनाई दिया वह पुनः उठकर देखने लगा लेकिन शोर का कोई कारण ना जानने पर पुनः अपनी थाली पर बैठ गया और शोर को अनसुना करके भोजन कर लिया। दिन का थका मांदा आदमी जब चारपाई पर लेटता है तो उसकी आँखों में ना तो उम्मीद होती है और ना ही हसीन सपने होती है तो केवल मीठी नींद। सुबह चेतन के डेरे के चारों तरफ़ कोलाहल था गांव के लोगों को अजीब भय के साथ शंकाएं घेरने लगीं चेतन का शव उसकी चारपाई पर ढका हुआ था। कहते हैं पशु पक्षी हमें हमेशा बङे संकट से पहले चिल्लाकर सतर्क करते हैं, चिड़ियों का शोर पीवणा सर्प के कारण था और उसी ने चेतन को रात्रि में डस लिया। मीनल आसू की नवमी की चांदनी में पति का इंतज़ार करती रही जबकि घर पर उसका प्यारा चेतन ना आकर उसका जहर से नीला शव उसके आंगन में पङा था, सिणगार के कोड रुदाली की चीखों में बदलकर पूरी कायनात को कह रहे थे कि अभागों की स्नेहिलताएं भी कफ़नों से लिपटी हुई आती है और दुख के नासूर जख़्म दे जाती है जो कभी नहीं भरे जाते। घर के पीछे की तरफ़ निकलने वाले कच्चे रास्ते से पत्थरों से भरा ट्रैक्टर जा रहा था,जिसके टेप में धीमी राग में बज रहा था एक गीत-"मोणीगर रैवो नी आजूणी रात"।
- -तेज़स......
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