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Showing posts from October, 2018

गीत कविता-मन में रोज़ तुम्हारी सारी लाज़ दिखाई देती है....

उन लफ़्जों की बात बात में  साज सुनाई देती है मन में रोज़ तुम्हारी सारी  लाज दिखाई देती है।। जीवन था कुछ बिखरा उखङा मजलिस में भी मौन खङा ख़ामोश दिनों की बात कहीं  जो आज सुनाई देती है। मन में रोज़  तुम्हारी  सारी  लाज  दिखाई  देती  है।। आज दिलों के बंद दरवाजे किस्से काज कहाँ है ताजे बैठे थे तुम साथ मेरे वह रात दिखाई देती है। मन में रोज़ तुम्हारी सारी लाज दिखाई देती है।। ओ मेरी अय जगमग ज्योति अंधियारे के उजला मोती बात बात पर ख़्याल करे वह आँख दिखाई देती है। मन में रोज़  तुम्हारी  सारी   लाज  दिखाई  देती  है।। अंतर के तुम ओम  बने  हो विकल रागिनी व्योम बने हो नवल गीत की रागों सी मुस्कान दिखाई देती है। मन में रोज़ तुम्हारी सारी लाज दिखाई देती है।। ---तेज़स...

सूफ़ी दर्शन को समर्पित दोहे

🔰"अनहद नाद सप्तक"🔰 (Sufism philosophy) लहरी रंग लगावणी,पहरी आठौं पौर। गहरी बाजै गागरी,सुण लै बहरी शौर।। नाखूँ झाड़ा नैह रा,राखूँ ओट छिपाय। दाखूँ अरजी दीवळा,आप उजाळौ आय।। भरली गांठी बाथ में,करली काठी डोळ। धरली धीरप ध्यान सूँ,परली लांघण पौळ।। सुण अणदीठा सायबा,भर मत रै भरमास। तू कहसी आ तावड़ौ,म्हैं कहसूँ उजियास।। नगटां आळै नैह सूँ,मोळौ राख्यौ मैळ। बुझगी सचरी बातियाँ,खलक करै अब खेल। पथ में पागी पाँतरै,आगै घोर अँधार। चाँदौ आभै चमकसी,धेजौ हिवड़ै धार।। रंग चढ़ायौ राजवी,दंग भयो दरवेश। भंग चढ़ाई भांत री,चंग भयो चितदेश।।                  ---तेज़स...
राजस्थानी मांय कविता 'ऊजळौ मारग' कुणसे दिन में किण पागोठै, पापाड़ै सूँ पग मांडया। परमाणां री लांबी चौड़ी' लिस्ट कठै सूँ अब ला दयां ।। अंतर रा आंटा रै मांई , चोरी छुरियाँ चळकावै, पीठां गैलां करै पिचरका, परतख बोल ना पावै है। जीया जूण रा जंजाळां में, गिरबौ गैलां रह जासी। थोथी बातां दिन थोड़ां री, अकल भचीड़ै आ जासी।। प्यासौ मिरगौ पेट कारणै, घणा घुमेरा घालै । पलक झबूकै पल्टयौ आसी, सिंघ झफीड़ा कुण झालै ।। लांबा मारग,भुरट भलेरा, कांटा मन में चुभ जासी। नेकी कर कर नांख कुआं में, पुण्य पखालां पा जासी।। आडंबर सै अकड़ रहया है, आसै -पासै, इण बस्ती। नज़रां नीच्या नाक चोरसी, सो मत ऊंडी मस्ती।। ऊँची सोच्यां उजळौ मारग, छोट-मोट सै रह जावै। पग-पग दूजी पीड़ पखाळै, राम भरोसौ रह जावै।। ---तेज़स...

कोटड़ी कलरव...(रेगिस्तान में मेहमानों के व पुरुषवर्ग के ठहरने की घर से अलग जगह)

कोटड़ी कलरव-1 मैंने मेरा सामर्थ्य इतना विशाल बना दिया कि  मेरे "घड़े, चिलम के खीरे की धूणी, चारपाई के मथांतिये-पगांथिये,बाहर खड़े नीम की सरसराहट" आदि में  हज़ारों पीड़ाओं को समेट लिया। मेरे संबंध में किसी ने कहा कि तेरे उपकारों के बदले मैं तुम्हें लिपिबद्ध करना चाहता हूँ, तब मैं बोली कि तू  मात्र मुझे ही लिखेगा तो मेरे अन्य साथी नाराज़ हो जाएंगे, तुम्हें रियाण-रपाण में बैठकर ठहाके लगाने वालों को शामिल करना होगा, तुम्हें बेरियों की बरतें व चड़स सीलते अनेकों सींचारूओं को शामिल करना    होगा,तुम्हें दीपावली के रामा-श्यामाओं और आखातीज के खीच और गुळराब को शामिल करना होगा।तुम तो बरस भर में एक दफ़े मिलने आते हो पिछली बार जब रावजी ने बही पढ़ी तो मेघूदान  बाजी ने अमलों का रंग डेढ़ घंटे तक पढ़ा, इतने नाम मैंने पहले कभी नहीं सुने, बाजी की वाणी मेरी दीवारों से टकराती और खेतसिंग बा हरेक अमलों के दोहे के ख़त्म के बाद वाह बाजी,लख धिनकार बाजी  पढ़ते हुए कमीज़ बाजू पर  चढ़ाते जाते।तुम्हें उन नासेटूओं को शामिल करना होगा,जिनकी थकावट के पसीनों को मैंने डाखणे बायरिये से पों...