कहानी----"जानकी से मोनालिसा तक"
..उसके चेहरे पर खरोंचों के दाग आज बीस दिन बाद उसने देखे थे, अस्पताल के ही शिशे में।होश भी आज ही आया था ,उसे नहीं पता कि दो बार कौमा में मौत उसके सर पर हाथ फेरकर लौरी सुना गई थी।मासूमियत उसके पोरों से रिसकर बड़े अस्पताली लिबास को भिगो रही थी, बाहर माँ गूसलखाने का दरवाज़ा रह रहकर बजा कर कह रही थी"बेटू बाहर आ रंजन के पिता आज जोधपुर से नया वकील लेकर आए हैं ।" मोनालिसा के आंसू आँखों के भींचने से और तेज हो गए ,हाथों की अंगुलियों को कसकर सर के दोनों तरफ़ पकड़कर फफकती रही।
बाहर के शोरगुल से बेख़बर वह अपने भीतर चल रहे शोरगुल को रोक नहीं पा रही थी।घुटनों के बल बैठकर बालों को संवारने की नाकाम कोशिश की पर वे फिर बिखर गए।वह दीवार के सहारे चलकर खड़ी हुई तब तक बाहर का शोरगुल हो हल्ले में बदल गया,उसने आंसुओं को पोंछा और अंतर की फफकन को मुंह से लम्बी आहें भरकर कम किया और सहमी सी बाहर आकर माँ के पीछे खड़ी हो गई,बाहर पिताजी ने वकील को कुर्सी पर बिठाकर मोनालिसा को भी बिठा दिया,मोनालिसा का हाथ उसकी माँ ने थाम रखा था।जीपी साहब(वकील) ने मोनालिसा के पिता की तरफ़ देखकर कहा"चिंतित ना हों राघव जी हम हाईकोर्ट में पुख़्ता बयान देंगे, ईश्वर ने चाहा तो सब ठीक ही रहेगा।"
उसके पिता ने उसका नाम मोनालिसा रखा था।शहर के शीर्ष भाग में रचा बसा परिवार जहाँ शहर पहले शहर ना होकर कस्बा हुआ करता था।मोनालिसा की आँखें तथा भीगी व झीनी सी मुस्कान उसके नाम को चरितार्थ कर रही थी।यह रेगिस्तां की मोनालिसा थी।पिता का स्नेह व माँ की गोदी का चहेता होना रेगिस्तां की हरेक बेटी के भाग में नहीं होता,पर मोनालिसा को यह दोनों सौभाग्य प्राप्त थे।छोटे भाई रंजन की देखभाल में पूरा दिन बीत जाया करता कि वह अपना होमवर्क भूल जाया करती।राघव शहर की रामलीला कमेटी का चैयरमैन था, रामलीला के आयोजन में राजा जनक का किरदार पिछले डेढ़ दशक से निभाता आ रहा था।अभिनय करने का सबसे बड़ा भय यही होता है कि ना जाने कौनसा किरदार चरित्र का हिस्सा बनकर ताज़िंदगी साथ रहे,राघव घर आकर भी मोनालिसा के सामने अभिनय के अंश कहता रहता-सीते तुम्हारा नाम मोनालिसा रखा है हमने तुम हमारे संपूर्ण जीवन का उजला पन्ना हो, मेरी मोनालिसे तेरा भाग्य उजला है।"
दिनों के साथ में किरदार बड़े बनते गए और ना जाने मोनालिसा ने कैसे बारहवीं उतीर्ण की ख़बर ही ना चली।राघव की छत से शहर का पूरा भाग दिखाई देता था।छत पर रंजन के हाथों को उलझाते सुलझाते राघव उसे रामायण की कहानियाँ सुनाया करता और मोनालिसा छत से शहर की तमाम बड़ी इमारतों की रोशनी, ट्रेन की आवाज़ाही और पीछे का शांत पहाड़ देखती रहती।उसे शहर की रोशनी से चाव था तो घुप अंधेरों वाले पहाड़ से डर।कॉलेज का फर्स्ट डे था मोना की तमाम सहेलियों ने कॉलेज में रंगोलियाँ बनाईं, मोना के हाथों ने कुछ रंग बेकारण बालों को कानों के पीछे करने के चलते गालों पर लगा दिया।उत्साह से बीता दिन कॉलेज की बाउंड्री के बाहर ख़ामोश हो जाया करता है।रावणों का किरदार निभाने को भीड़ का गंदलापन इतना हावी हो जाता है कि हैवानियत और इंसानियत के लिबासों में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।मोना को अचानक से पीछे से पकड़ा, मोना कुछ संभल पाती इससे पहले ही वह काले इल्म लगी गाड़ी की पिछली सीट पर थी, उसके मुँह पर हाथ का जोर था और आगे की सीट पर उसके पैर एक महिला ही पकड़े हुए थी,वह शहर के रईस दिगम्बर का बेटा शशि था।लाड प्यार के पुचकारे कभी कभी इकलौती संतानों को इतनी छूट दे देते हैं कि अपराधों से उनका नाता अभिन्न होता है।पहाड़ों के उसी घुप अंधेरे में राघव की मोना के भाग्य में वह सब लिखा गया जो उसके भाग्य में नहीं लिखा था।दरिंदगी की छाती पर उजलापन चीखता चिल्लाता व रोता रहा पर जब इंसानियत ही हैवानियत के लिबास ओढ़कर हमारे आसपास नग्न नृत्य करती है तो महज़ झूठे आश्वासनों के सिवाय क्या कर सकते हैं।
राघव शहर के तमाम हिस्सों में पुलिस के साथ रंजन को गोदी में लिए अपनी मोनालिसे को ढूँढता रहा।अंत में शहर के सुभाष चौक पर चीख और पुकार का घेरा रात के बारह बजे पूरे रास्ते को जाम करके खड़ा था, भीड़ के बीच राघव की मोनालिसे थी और मोनालिसे के भीतर नासूर जख़्म था जो आजीवन भरा नहीं जाने वाला था।जनक की जानकी के साथ ऐसा तो नहीं हुआ था पर राघव की मोना के साथ वह सब हुआ जो ताज़िंदगी दुख व दर्द के सिवाय कुछ नहीं दे सकता था।
जी पी साहब ने अपने बयान पूरे किए मोनालिसा को घर लाया गया।हाँ ऐसे दृश्य की कल्पना भला कौनसा जनक(पिता)करेगा जिनकी मोनलिसाओं का प्रथम दिन कॉलेज में और फिर एक महीना ऐसा कि जो सारे परिवार का सुख चैन लूट ले जाए, कुसूर ना होते हुए भी वह सब दंड भोगना जिसके हकदार कोई और है।पूरा घर ख़ामोशी की गहरी चिता पर जला जा रहा था।धंधे और पानी से दूर राघव घर से बाहर निकलने की ज़हमत भी नहीं उठा सकता था।मोनालिसा हादसे के दो महीने बाद नीरव शाम में छत पर बैठी थी।घर के पीछे की तरफ़ पहाड़ी से इकट्ठा होने वाला पानी गहरी खाई में जाकर ऊपर हरी पपड़ी जमाकर बरसों तक जमा पड़ा था।पीछे की तरफ़ से उतर कर वह खाई की ओर जाने लगीं, हाँ आज उसे शहर की रोशनी से भय था लेकिन पहाड़ी से नहीं।वह उस हरी काई वाले गड्डे में उतरती गई।जनक की सीते तो अग्निपरीक्षा के बाद ज़िंदा रही थी लेकिन राघव की मोनालिसे जल परीक्षा के बाद ज़िंदा नहीं रही।सुबह ही राघव जोधपुर से डीएनए की पोज़िटिव रिपोर्ट लेकर इस खुशी में घर पहुँच रहा था कि अब इंसाफ़ का हाथ मेरे तमाम दुख दर्द के आंसू धो देगा और मेरी मोनालिसे को भी नई ज़िंदगी मिलेगी।इतने में खाई के पास की भीड़ उसे वहाँ खींच ले गई, भीड़ के बीच उसका छोटा सा बेटा रंजन हरी काई से लथपथ मोना का हाथ थामे उसे उठाने की मासूम कोशिश कर रहा था, राघव की पत्नी वहीं बेसुध पड़ी थी।राघव घुटनों के बल बैठा जनक की सीते को मोनालिसे से अधिक भागवान समझ रहा था, शहर में मोनालिसाओं की चहचहाहट की जगह दिगम्बरों के शशियों का शोर था।डीएनए की रिपोर्ट के पन्ने पहाड़ी के खगालों में बिखरते उड़ते जा रहे थे ।
---तेज़स...
..उसके चेहरे पर खरोंचों के दाग आज बीस दिन बाद उसने देखे थे, अस्पताल के ही शिशे में।होश भी आज ही आया था ,उसे नहीं पता कि दो बार कौमा में मौत उसके सर पर हाथ फेरकर लौरी सुना गई थी।मासूमियत उसके पोरों से रिसकर बड़े अस्पताली लिबास को भिगो रही थी, बाहर माँ गूसलखाने का दरवाज़ा रह रहकर बजा कर कह रही थी"बेटू बाहर आ रंजन के पिता आज जोधपुर से नया वकील लेकर आए हैं ।" मोनालिसा के आंसू आँखों के भींचने से और तेज हो गए ,हाथों की अंगुलियों को कसकर सर के दोनों तरफ़ पकड़कर फफकती रही।
बाहर के शोरगुल से बेख़बर वह अपने भीतर चल रहे शोरगुल को रोक नहीं पा रही थी।घुटनों के बल बैठकर बालों को संवारने की नाकाम कोशिश की पर वे फिर बिखर गए।वह दीवार के सहारे चलकर खड़ी हुई तब तक बाहर का शोरगुल हो हल्ले में बदल गया,उसने आंसुओं को पोंछा और अंतर की फफकन को मुंह से लम्बी आहें भरकर कम किया और सहमी सी बाहर आकर माँ के पीछे खड़ी हो गई,बाहर पिताजी ने वकील को कुर्सी पर बिठाकर मोनालिसा को भी बिठा दिया,मोनालिसा का हाथ उसकी माँ ने थाम रखा था।जीपी साहब(वकील) ने मोनालिसा के पिता की तरफ़ देखकर कहा"चिंतित ना हों राघव जी हम हाईकोर्ट में पुख़्ता बयान देंगे, ईश्वर ने चाहा तो सब ठीक ही रहेगा।"
उसके पिता ने उसका नाम मोनालिसा रखा था।शहर के शीर्ष भाग में रचा बसा परिवार जहाँ शहर पहले शहर ना होकर कस्बा हुआ करता था।मोनालिसा की आँखें तथा भीगी व झीनी सी मुस्कान उसके नाम को चरितार्थ कर रही थी।यह रेगिस्तां की मोनालिसा थी।पिता का स्नेह व माँ की गोदी का चहेता होना रेगिस्तां की हरेक बेटी के भाग में नहीं होता,पर मोनालिसा को यह दोनों सौभाग्य प्राप्त थे।छोटे भाई रंजन की देखभाल में पूरा दिन बीत जाया करता कि वह अपना होमवर्क भूल जाया करती।राघव शहर की रामलीला कमेटी का चैयरमैन था, रामलीला के आयोजन में राजा जनक का किरदार पिछले डेढ़ दशक से निभाता आ रहा था।अभिनय करने का सबसे बड़ा भय यही होता है कि ना जाने कौनसा किरदार चरित्र का हिस्सा बनकर ताज़िंदगी साथ रहे,राघव घर आकर भी मोनालिसा के सामने अभिनय के अंश कहता रहता-सीते तुम्हारा नाम मोनालिसा रखा है हमने तुम हमारे संपूर्ण जीवन का उजला पन्ना हो, मेरी मोनालिसे तेरा भाग्य उजला है।"
दिनों के साथ में किरदार बड़े बनते गए और ना जाने मोनालिसा ने कैसे बारहवीं उतीर्ण की ख़बर ही ना चली।राघव की छत से शहर का पूरा भाग दिखाई देता था।छत पर रंजन के हाथों को उलझाते सुलझाते राघव उसे रामायण की कहानियाँ सुनाया करता और मोनालिसा छत से शहर की तमाम बड़ी इमारतों की रोशनी, ट्रेन की आवाज़ाही और पीछे का शांत पहाड़ देखती रहती।उसे शहर की रोशनी से चाव था तो घुप अंधेरों वाले पहाड़ से डर।कॉलेज का फर्स्ट डे था मोना की तमाम सहेलियों ने कॉलेज में रंगोलियाँ बनाईं, मोना के हाथों ने कुछ रंग बेकारण बालों को कानों के पीछे करने के चलते गालों पर लगा दिया।उत्साह से बीता दिन कॉलेज की बाउंड्री के बाहर ख़ामोश हो जाया करता है।रावणों का किरदार निभाने को भीड़ का गंदलापन इतना हावी हो जाता है कि हैवानियत और इंसानियत के लिबासों में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।मोना को अचानक से पीछे से पकड़ा, मोना कुछ संभल पाती इससे पहले ही वह काले इल्म लगी गाड़ी की पिछली सीट पर थी, उसके मुँह पर हाथ का जोर था और आगे की सीट पर उसके पैर एक महिला ही पकड़े हुए थी,वह शहर के रईस दिगम्बर का बेटा शशि था।लाड प्यार के पुचकारे कभी कभी इकलौती संतानों को इतनी छूट दे देते हैं कि अपराधों से उनका नाता अभिन्न होता है।पहाड़ों के उसी घुप अंधेरे में राघव की मोना के भाग्य में वह सब लिखा गया जो उसके भाग्य में नहीं लिखा था।दरिंदगी की छाती पर उजलापन चीखता चिल्लाता व रोता रहा पर जब इंसानियत ही हैवानियत के लिबास ओढ़कर हमारे आसपास नग्न नृत्य करती है तो महज़ झूठे आश्वासनों के सिवाय क्या कर सकते हैं।
राघव शहर के तमाम हिस्सों में पुलिस के साथ रंजन को गोदी में लिए अपनी मोनालिसे को ढूँढता रहा।अंत में शहर के सुभाष चौक पर चीख और पुकार का घेरा रात के बारह बजे पूरे रास्ते को जाम करके खड़ा था, भीड़ के बीच राघव की मोनालिसे थी और मोनालिसे के भीतर नासूर जख़्म था जो आजीवन भरा नहीं जाने वाला था।जनक की जानकी के साथ ऐसा तो नहीं हुआ था पर राघव की मोना के साथ वह सब हुआ जो ताज़िंदगी दुख व दर्द के सिवाय कुछ नहीं दे सकता था।
जी पी साहब ने अपने बयान पूरे किए मोनालिसा को घर लाया गया।हाँ ऐसे दृश्य की कल्पना भला कौनसा जनक(पिता)करेगा जिनकी मोनलिसाओं का प्रथम दिन कॉलेज में और फिर एक महीना ऐसा कि जो सारे परिवार का सुख चैन लूट ले जाए, कुसूर ना होते हुए भी वह सब दंड भोगना जिसके हकदार कोई और है।पूरा घर ख़ामोशी की गहरी चिता पर जला जा रहा था।धंधे और पानी से दूर राघव घर से बाहर निकलने की ज़हमत भी नहीं उठा सकता था।मोनालिसा हादसे के दो महीने बाद नीरव शाम में छत पर बैठी थी।घर के पीछे की तरफ़ पहाड़ी से इकट्ठा होने वाला पानी गहरी खाई में जाकर ऊपर हरी पपड़ी जमाकर बरसों तक जमा पड़ा था।पीछे की तरफ़ से उतर कर वह खाई की ओर जाने लगीं, हाँ आज उसे शहर की रोशनी से भय था लेकिन पहाड़ी से नहीं।वह उस हरी काई वाले गड्डे में उतरती गई।जनक की सीते तो अग्निपरीक्षा के बाद ज़िंदा रही थी लेकिन राघव की मोनालिसे जल परीक्षा के बाद ज़िंदा नहीं रही।सुबह ही राघव जोधपुर से डीएनए की पोज़िटिव रिपोर्ट लेकर इस खुशी में घर पहुँच रहा था कि अब इंसाफ़ का हाथ मेरे तमाम दुख दर्द के आंसू धो देगा और मेरी मोनालिसे को भी नई ज़िंदगी मिलेगी।इतने में खाई के पास की भीड़ उसे वहाँ खींच ले गई, भीड़ के बीच उसका छोटा सा बेटा रंजन हरी काई से लथपथ मोना का हाथ थामे उसे उठाने की मासूम कोशिश कर रहा था, राघव की पत्नी वहीं बेसुध पड़ी थी।राघव घुटनों के बल बैठा जनक की सीते को मोनालिसे से अधिक भागवान समझ रहा था, शहर में मोनालिसाओं की चहचहाहट की जगह दिगम्बरों के शशियों का शोर था।डीएनए की रिपोर्ट के पन्ने पहाड़ी के खगालों में बिखरते उड़ते जा रहे थे ।
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