कहानी---"इश्क़ है दरिया जादू का"......
नेशनल हैंडलूम की सीढ़ियों पर विश्वजीत को वो दिखाई दिया जिसे उसकी आँखें हरेक आती जाती स्कूली ड्रेस में देखा करती थी। पर यह स्कूल ड्रेस नहीं थी यह केशर वरणी चुनरी ओढे उसकी निहारिका थी। "न.. नि... निहारिका ओ निहारिका ओ निहारिका....सीढियों के तले से निहारिका ने ऊपर देखा और पहली निगाह में ही पहचान लिया उसे। वह दौङकर उससे लिपटना चाहती थी पर हैंडलूम में कौतूहल होने के डर से वह मुस्कान बिखेर कर खङी रही। विश्वजीत सीढ़ियों से दौङकर उसके पास आकर कुछ कहने ही वाला था कि निहारिका ने उसे खींचकर आइस्क्रीम कार्नर की बगल में ले जाकर उसे अपने नंबर साझा किए और कैफे में मिलने का कहकर चल दी। निहारिका तुमने तीन दिन बिता दिए आने का कहकर पर आज भी तुम नहीं आई मैं पूरा दिन माॅम्स कैफे में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ। अरे विभू मैं आज नहीं आऊंगी सो सोरी विभू, हम अगले हफ्ते मिलेंगे। कहकर निहारिका ने फोन काट दिया। रेगिस्तां की पहाड़ियों के बीच एक शहर जो लू की लपटों को सहकर बङा हुआ है, विकास नाम के बैल से कई बार मार खाई, लेकिन संभलकर चलने का हुनर इसके कुछ अक्लमंद लोगों के कारण बनता गया। शहर जवां हो रहा था और शहर के वो किस्से भी जवां हो रहे थे जिन्हें चढना था शहर वासियों की जबां पर।निहारिका शहर के बीच पली बढी लेकिन उसे प्यार था अपने गाँव से। जब भी उसे गाँव जाने की ख़बर मिलती वह स्टडी टेबल को उन पन्नों से भर देती जो गाँव के चित्रों से अटे पङे थे। विभू का पूरा नाम था विश्वजीत, गाँव, गली व श्मशान के हज़ारों किस्से उसे याद थे क्योंकि उसके पिता भी शहर के वो कवि थे जिन्हें कवि सम्मेलनों में ना बुलाने पर भी शरीक होने के नुस्खे ज्ञात थे। अक्सर वे एक कविता गाया करते और रो जाया करते थे
"पढ़ाई वाला प्रेम
ज़िंदा रहता है उम्रभर
छिपा रहता है हृदय में
तुझसे ख़ामोश कौन भला
ओ पढ़ाई वाले प्रेम "
विश्वजीत व निहारिका की भेंट तीन साल पहले दसवीं में हुई थी। शहर की काॅलोनी अलग हो तो क्या हुआ स्कूल बस सभी को जोङ देती है, कक्षा में तो सिर्फ़ चाॅक और डस्टर का युद्ध चलता है पर बस में चाॅक और डस्टर का नहीं केवल और केवल आँखों का युद्ध चलता है। उसी युद्ध के दो पराजित योद्धा थे विश्वजीत और निहारिका।वे लोग भाग्य को अपने हाथों से लिखवाकर लाते हैं जिन्हें हरेक सवेरे उन आँखों का दीदार होता है जिसमें ना केवल काजल की रेखाएं होती हैं अपितु उसमें वह सब होता है जो अभागों को हज़ारों श्रापों से मुक्ति दिला दे। जब ज़बां मौन रहकर केवल तालू से चिपककर सपने बुनने लगे उस भविष्य के जिन्हें कभी सच्च होना ही नहीं है तो उस वक़्त आँखों को कई किरदार निभाने होते हैं जीवन के श्रद्धा पुष्पों को देखना, उसी समय ईश्वर को इन्हीं आँखों से धन्यवाद ज्ञापित करना, इन्हीं आँखों से उन आँखों की हिफाजत की दुआएं पढना और इन्हीं आँखों से वह सब संभालना जो छिपाकर रखे निहारिका व विश्वजीत को उस शहर के उन किस्सेगारों से जिन्हें इंतज़ार होता है ऐसी कहानियों का। हाँ यह रेगिस्तां का प्यार था जिसमें पवित्रता के हुंकारे थे और निश्छलता की मनुहारें थीं। आज ग्यारहवीं का अंतिम दिन था बस में दो आकृतियाँ ख़ामोशी से वह सब बुना बुनाया नष्ट कर रही थीं जैसे कोई अभागा अपने ही घर को तिल तिल बिखेर दे। गर्मी के दिनों का पसीना आज एक साथ बह रहा था और इसने निहारिका की सुंदरता में कुछ और जोङ दिया जो हरेक अभागिन को सुंदर बनाने का स्वांग रचती है, विश्वजीत के घुंघराले बालों में रिस रिस कर वही पसीना उसे मासूमियत के तमाम प्रमाण पत्र दे रहा था। बस ने विश्वजीत के घर के आगे ब्रेक किए और ज़नाब को होश भी नहीं रहा। जब होश आया तो आँखों में सिर्फ़ एक अधजला अरमान और पीठ पर एक बैग था जो किताबों के भार से इतना भारी नहीं था पर एक बात थी दबी हुई जो उसकी पीठ ही नहीं हृदय की हरेक फांक को भारी किए हुए थी, हाँ आज उसने पहला प्रेम पत्र लिखा था जो उस बेग में ही ऊपर की चेन में दुबका पङा उसकी कायरता पर गालियाँ दे रहा था। उसके पिता अक्सर एक और कविता गाया करते थे -
"यह प्रेम की पहली चिठ्ठी
ज़िंदा रहती है उम्रभर
तेरा आखर आखर
रिसता रहता है
हृदय की कोरों पर
ओ पहली चिठ्ठी "
जब आँखों में छुट्टियां मनाने की योजनाओं की जगह उनींदापन और अधूरापन हो,जब यौवन के उन्माद की जगह चिंताओं के तूफां हों, उजले अरमानों की जगह धुंधली यादें बची हुई हों तो यही समझना बेहतर होता है कि स्नेहिलताएं और श्रद्धा बिंदु कभी स्वार्थों के कंधों पर नहीं चल सकते, उन्हें दुर्दशा व दुखों की भट्टी में तपाया जाता है। दिन ढलते गए और ढलते दिनों में बिछुड़ने के रंग करीब आते गए बारहवीं के पहले दिन निहारिका ने भी अपने बस्ते का भार बढा दिया और सुंदर रंगों के प्रयोग से एक चित्र और चित्र के साथ में कुछ टूटे अल्फाज़ जो कभी अपने पाठक तक पहुँचने वाले नहीं थे। बस में निहारिका ने पूरी सीटों को देखा, ड्राईवर का केबिन देखा लेकिन वहाँ वो आँखें नहीं थीं जिन्हें निहारिका की आँखें ढूँढ रही थीं। उसने कक्षा में पहुँचने का इंतज़ार किया कि शायद वो बस में ना आकर सीधे कक्षा में ही मिल जाए। कक्षा में भी उसे वह सब उसे नहीं मिला जिसे निहारिका ढूँढना चाहती थी। उसकी ख़ामोशी को एक सहेली ने यह कहकर और ख़ामोश कर दिया कि विश्वजीत यहाँ से टीसी ले जाने वाले छात्रों की सूची में हैं। जब कभी मासूमियत की उजली दीवारों पर छोटे छोटे दुख के छींटे लगते हैं तो वह दीवारें बेहद गंदली नज़र आती है। जब कभी संवेदनाओं का कत्ल बिना हथियारों के होनहार के हाथों होता है तो सुबकने व आँसू रिसने के अलावा कोई हलचल नहीं होती। ख़ामोशी की दुनिया में इतनी घुटन व स्वयं को इतने उलाहने देने होते हैं कि कान बंद करके रोना ही बेहतर नज़र आता है। तमाम दुख दर्द रिसते रहते हैं आँखों की कोरों से और भीगते रहते हैं कभी तकिये तो कभी छत की दीवारें तो कभी वही ड्राइंग सीट्स जिसमें रंगों की जगह भरे होते हैं ख्वाब और धुंधले होते जाते हैं बूंद दर बूंद। उसके पिता की एक और कविता थी
"ओ इश्क़ के पहले आंसू
तू सूखता नहीं ज़िंदगी भर
तेरा गीलापन सदैव
भिगोता है अंतर के सूखे को
तुझे सुखाया नहीं जा सकता
ओ इश्क़ के पहले आंसू "
महावीर पार्क से सटा हुआ कोस्टर्स कैफे का कोना और उस कोने में वही प्रेम पत्र दो आकृतियों ने साझा किए एक के साथ चित्र था जिसमें एक रेगिस्तां का एक घर जो अनहद रेत के समंदर के बीच सूनी जगह पर था उसमें नादानी सिर्फ़ इतनी थी कि उन रेतीले समंदर में एक नदी उस घर के आगे से निकाल दी। विश्वजीत को नदी देखकर हँसी आ गई और निहारिका ने भी हँसकर विश्वजीत का वह पहला व आखरी पत्र पढ़ा जो तीन बरस पहले लिखा था उसमें भी नीचे की लाईन में लिखा था "सूरज पश्चिम में उदय होता नहीं इसलिए सच्चाई के तांतणों से बंधी स्नेहिलताएं कभी एकसार नहीं हो सकती।" दोनों ख़ामोश थे सङक पर लोगों की आवाजाही थी पार्क में एक और दुख की दास्तां अपनी भाग्यरेखा में दुख व बिछोह के रंग भर रही थी। रेगिस्तां का शहर दौङ रहा था अनेक किस्से अपने भीतर दबाए...शहर दौङ रहा था....
विश्वजीत के पिता की एक कविता और भी थी-
"इश्क़ है दरिया जादू का
जो गया सो डूब गया
इश्क़ दुखों का घर है
ओ इश्कज़ादों
इश्क़ नासूर जख़्म है "
---तेज़स...
नेशनल हैंडलूम की सीढ़ियों पर विश्वजीत को वो दिखाई दिया जिसे उसकी आँखें हरेक आती जाती स्कूली ड्रेस में देखा करती थी। पर यह स्कूल ड्रेस नहीं थी यह केशर वरणी चुनरी ओढे उसकी निहारिका थी। "न.. नि... निहारिका ओ निहारिका ओ निहारिका....सीढियों के तले से निहारिका ने ऊपर देखा और पहली निगाह में ही पहचान लिया उसे। वह दौङकर उससे लिपटना चाहती थी पर हैंडलूम में कौतूहल होने के डर से वह मुस्कान बिखेर कर खङी रही। विश्वजीत सीढ़ियों से दौङकर उसके पास आकर कुछ कहने ही वाला था कि निहारिका ने उसे खींचकर आइस्क्रीम कार्नर की बगल में ले जाकर उसे अपने नंबर साझा किए और कैफे में मिलने का कहकर चल दी। निहारिका तुमने तीन दिन बिता दिए आने का कहकर पर आज भी तुम नहीं आई मैं पूरा दिन माॅम्स कैफे में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ। अरे विभू मैं आज नहीं आऊंगी सो सोरी विभू, हम अगले हफ्ते मिलेंगे। कहकर निहारिका ने फोन काट दिया। रेगिस्तां की पहाड़ियों के बीच एक शहर जो लू की लपटों को सहकर बङा हुआ है, विकास नाम के बैल से कई बार मार खाई, लेकिन संभलकर चलने का हुनर इसके कुछ अक्लमंद लोगों के कारण बनता गया। शहर जवां हो रहा था और शहर के वो किस्से भी जवां हो रहे थे जिन्हें चढना था शहर वासियों की जबां पर।निहारिका शहर के बीच पली बढी लेकिन उसे प्यार था अपने गाँव से। जब भी उसे गाँव जाने की ख़बर मिलती वह स्टडी टेबल को उन पन्नों से भर देती जो गाँव के चित्रों से अटे पङे थे। विभू का पूरा नाम था विश्वजीत, गाँव, गली व श्मशान के हज़ारों किस्से उसे याद थे क्योंकि उसके पिता भी शहर के वो कवि थे जिन्हें कवि सम्मेलनों में ना बुलाने पर भी शरीक होने के नुस्खे ज्ञात थे। अक्सर वे एक कविता गाया करते और रो जाया करते थे
"पढ़ाई वाला प्रेम
ज़िंदा रहता है उम्रभर
छिपा रहता है हृदय में
तुझसे ख़ामोश कौन भला
ओ पढ़ाई वाले प्रेम "
विश्वजीत व निहारिका की भेंट तीन साल पहले दसवीं में हुई थी। शहर की काॅलोनी अलग हो तो क्या हुआ स्कूल बस सभी को जोङ देती है, कक्षा में तो सिर्फ़ चाॅक और डस्टर का युद्ध चलता है पर बस में चाॅक और डस्टर का नहीं केवल और केवल आँखों का युद्ध चलता है। उसी युद्ध के दो पराजित योद्धा थे विश्वजीत और निहारिका।वे लोग भाग्य को अपने हाथों से लिखवाकर लाते हैं जिन्हें हरेक सवेरे उन आँखों का दीदार होता है जिसमें ना केवल काजल की रेखाएं होती हैं अपितु उसमें वह सब होता है जो अभागों को हज़ारों श्रापों से मुक्ति दिला दे। जब ज़बां मौन रहकर केवल तालू से चिपककर सपने बुनने लगे उस भविष्य के जिन्हें कभी सच्च होना ही नहीं है तो उस वक़्त आँखों को कई किरदार निभाने होते हैं जीवन के श्रद्धा पुष्पों को देखना, उसी समय ईश्वर को इन्हीं आँखों से धन्यवाद ज्ञापित करना, इन्हीं आँखों से उन आँखों की हिफाजत की दुआएं पढना और इन्हीं आँखों से वह सब संभालना जो छिपाकर रखे निहारिका व विश्वजीत को उस शहर के उन किस्सेगारों से जिन्हें इंतज़ार होता है ऐसी कहानियों का। हाँ यह रेगिस्तां का प्यार था जिसमें पवित्रता के हुंकारे थे और निश्छलता की मनुहारें थीं। आज ग्यारहवीं का अंतिम दिन था बस में दो आकृतियाँ ख़ामोशी से वह सब बुना बुनाया नष्ट कर रही थीं जैसे कोई अभागा अपने ही घर को तिल तिल बिखेर दे। गर्मी के दिनों का पसीना आज एक साथ बह रहा था और इसने निहारिका की सुंदरता में कुछ और जोङ दिया जो हरेक अभागिन को सुंदर बनाने का स्वांग रचती है, विश्वजीत के घुंघराले बालों में रिस रिस कर वही पसीना उसे मासूमियत के तमाम प्रमाण पत्र दे रहा था। बस ने विश्वजीत के घर के आगे ब्रेक किए और ज़नाब को होश भी नहीं रहा। जब होश आया तो आँखों में सिर्फ़ एक अधजला अरमान और पीठ पर एक बैग था जो किताबों के भार से इतना भारी नहीं था पर एक बात थी दबी हुई जो उसकी पीठ ही नहीं हृदय की हरेक फांक को भारी किए हुए थी, हाँ आज उसने पहला प्रेम पत्र लिखा था जो उस बेग में ही ऊपर की चेन में दुबका पङा उसकी कायरता पर गालियाँ दे रहा था। उसके पिता अक्सर एक और कविता गाया करते थे -
"यह प्रेम की पहली चिठ्ठी
ज़िंदा रहती है उम्रभर
तेरा आखर आखर
रिसता रहता है
हृदय की कोरों पर
ओ पहली चिठ्ठी "
जब आँखों में छुट्टियां मनाने की योजनाओं की जगह उनींदापन और अधूरापन हो,जब यौवन के उन्माद की जगह चिंताओं के तूफां हों, उजले अरमानों की जगह धुंधली यादें बची हुई हों तो यही समझना बेहतर होता है कि स्नेहिलताएं और श्रद्धा बिंदु कभी स्वार्थों के कंधों पर नहीं चल सकते, उन्हें दुर्दशा व दुखों की भट्टी में तपाया जाता है। दिन ढलते गए और ढलते दिनों में बिछुड़ने के रंग करीब आते गए बारहवीं के पहले दिन निहारिका ने भी अपने बस्ते का भार बढा दिया और सुंदर रंगों के प्रयोग से एक चित्र और चित्र के साथ में कुछ टूटे अल्फाज़ जो कभी अपने पाठक तक पहुँचने वाले नहीं थे। बस में निहारिका ने पूरी सीटों को देखा, ड्राईवर का केबिन देखा लेकिन वहाँ वो आँखें नहीं थीं जिन्हें निहारिका की आँखें ढूँढ रही थीं। उसने कक्षा में पहुँचने का इंतज़ार किया कि शायद वो बस में ना आकर सीधे कक्षा में ही मिल जाए। कक्षा में भी उसे वह सब उसे नहीं मिला जिसे निहारिका ढूँढना चाहती थी। उसकी ख़ामोशी को एक सहेली ने यह कहकर और ख़ामोश कर दिया कि विश्वजीत यहाँ से टीसी ले जाने वाले छात्रों की सूची में हैं। जब कभी मासूमियत की उजली दीवारों पर छोटे छोटे दुख के छींटे लगते हैं तो वह दीवारें बेहद गंदली नज़र आती है। जब कभी संवेदनाओं का कत्ल बिना हथियारों के होनहार के हाथों होता है तो सुबकने व आँसू रिसने के अलावा कोई हलचल नहीं होती। ख़ामोशी की दुनिया में इतनी घुटन व स्वयं को इतने उलाहने देने होते हैं कि कान बंद करके रोना ही बेहतर नज़र आता है। तमाम दुख दर्द रिसते रहते हैं आँखों की कोरों से और भीगते रहते हैं कभी तकिये तो कभी छत की दीवारें तो कभी वही ड्राइंग सीट्स जिसमें रंगों की जगह भरे होते हैं ख्वाब और धुंधले होते जाते हैं बूंद दर बूंद। उसके पिता की एक और कविता थी
"ओ इश्क़ के पहले आंसू
तू सूखता नहीं ज़िंदगी भर
तेरा गीलापन सदैव
भिगोता है अंतर के सूखे को
तुझे सुखाया नहीं जा सकता
ओ इश्क़ के पहले आंसू "
महावीर पार्क से सटा हुआ कोस्टर्स कैफे का कोना और उस कोने में वही प्रेम पत्र दो आकृतियों ने साझा किए एक के साथ चित्र था जिसमें एक रेगिस्तां का एक घर जो अनहद रेत के समंदर के बीच सूनी जगह पर था उसमें नादानी सिर्फ़ इतनी थी कि उन रेतीले समंदर में एक नदी उस घर के आगे से निकाल दी। विश्वजीत को नदी देखकर हँसी आ गई और निहारिका ने भी हँसकर विश्वजीत का वह पहला व आखरी पत्र पढ़ा जो तीन बरस पहले लिखा था उसमें भी नीचे की लाईन में लिखा था "सूरज पश्चिम में उदय होता नहीं इसलिए सच्चाई के तांतणों से बंधी स्नेहिलताएं कभी एकसार नहीं हो सकती।" दोनों ख़ामोश थे सङक पर लोगों की आवाजाही थी पार्क में एक और दुख की दास्तां अपनी भाग्यरेखा में दुख व बिछोह के रंग भर रही थी। रेगिस्तां का शहर दौङ रहा था अनेक किस्से अपने भीतर दबाए...शहर दौङ रहा था....
विश्वजीत के पिता की एक कविता और भी थी-
"इश्क़ है दरिया जादू का
जो गया सो डूब गया
इश्क़ दुखों का घर है
ओ इश्कज़ादों
इश्क़ नासूर जख़्म है "
---तेज़स...
Comments
Post a Comment