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Showing posts from 2018

गीत कविता-मन में रोज़ तुम्हारी सारी लाज़ दिखाई देती है....

उन लफ़्जों की बात बात में  साज सुनाई देती है मन में रोज़ तुम्हारी सारी  लाज दिखाई देती है।। जीवन था कुछ बिखरा उखङा मजलिस में भी मौन खङा ख़ामोश दिनों की बात कहीं  जो आज सुनाई देती है। मन में रोज़  तुम्हारी  सारी  लाज  दिखाई  देती  है।। आज दिलों के बंद दरवाजे किस्से काज कहाँ है ताजे बैठे थे तुम साथ मेरे वह रात दिखाई देती है। मन में रोज़ तुम्हारी सारी लाज दिखाई देती है।। ओ मेरी अय जगमग ज्योति अंधियारे के उजला मोती बात बात पर ख़्याल करे वह आँख दिखाई देती है। मन में रोज़  तुम्हारी  सारी   लाज  दिखाई  देती  है।। अंतर के तुम ओम  बने  हो विकल रागिनी व्योम बने हो नवल गीत की रागों सी मुस्कान दिखाई देती है। मन में रोज़ तुम्हारी सारी लाज दिखाई देती है।। ---तेज़स...

सूफ़ी दर्शन को समर्पित दोहे

🔰"अनहद नाद सप्तक"🔰 (Sufism philosophy) लहरी रंग लगावणी,पहरी आठौं पौर। गहरी बाजै गागरी,सुण लै बहरी शौर।। नाखूँ झाड़ा नैह रा,राखूँ ओट छिपाय। दाखूँ अरजी दीवळा,आप उजाळौ आय।। भरली गांठी बाथ में,करली काठी डोळ। धरली धीरप ध्यान सूँ,परली लांघण पौळ।। सुण अणदीठा सायबा,भर मत रै भरमास। तू कहसी आ तावड़ौ,म्हैं कहसूँ उजियास।। नगटां आळै नैह सूँ,मोळौ राख्यौ मैळ। बुझगी सचरी बातियाँ,खलक करै अब खेल। पथ में पागी पाँतरै,आगै घोर अँधार। चाँदौ आभै चमकसी,धेजौ हिवड़ै धार।। रंग चढ़ायौ राजवी,दंग भयो दरवेश। भंग चढ़ाई भांत री,चंग भयो चितदेश।।                  ---तेज़स...
राजस्थानी मांय कविता 'ऊजळौ मारग' कुणसे दिन में किण पागोठै, पापाड़ै सूँ पग मांडया। परमाणां री लांबी चौड़ी' लिस्ट कठै सूँ अब ला दयां ।। अंतर रा आंटा रै मांई , चोरी छुरियाँ चळकावै, पीठां गैलां करै पिचरका, परतख बोल ना पावै है। जीया जूण रा जंजाळां में, गिरबौ गैलां रह जासी। थोथी बातां दिन थोड़ां री, अकल भचीड़ै आ जासी।। प्यासौ मिरगौ पेट कारणै, घणा घुमेरा घालै । पलक झबूकै पल्टयौ आसी, सिंघ झफीड़ा कुण झालै ।। लांबा मारग,भुरट भलेरा, कांटा मन में चुभ जासी। नेकी कर कर नांख कुआं में, पुण्य पखालां पा जासी।। आडंबर सै अकड़ रहया है, आसै -पासै, इण बस्ती। नज़रां नीच्या नाक चोरसी, सो मत ऊंडी मस्ती।। ऊँची सोच्यां उजळौ मारग, छोट-मोट सै रह जावै। पग-पग दूजी पीड़ पखाळै, राम भरोसौ रह जावै।। ---तेज़स...

कोटड़ी कलरव...(रेगिस्तान में मेहमानों के व पुरुषवर्ग के ठहरने की घर से अलग जगह)

कोटड़ी कलरव-1 मैंने मेरा सामर्थ्य इतना विशाल बना दिया कि  मेरे "घड़े, चिलम के खीरे की धूणी, चारपाई के मथांतिये-पगांथिये,बाहर खड़े नीम की सरसराहट" आदि में  हज़ारों पीड़ाओं को समेट लिया। मेरे संबंध में किसी ने कहा कि तेरे उपकारों के बदले मैं तुम्हें लिपिबद्ध करना चाहता हूँ, तब मैं बोली कि तू  मात्र मुझे ही लिखेगा तो मेरे अन्य साथी नाराज़ हो जाएंगे, तुम्हें रियाण-रपाण में बैठकर ठहाके लगाने वालों को शामिल करना होगा, तुम्हें बेरियों की बरतें व चड़स सीलते अनेकों सींचारूओं को शामिल करना    होगा,तुम्हें दीपावली के रामा-श्यामाओं और आखातीज के खीच और गुळराब को शामिल करना होगा।तुम तो बरस भर में एक दफ़े मिलने आते हो पिछली बार जब रावजी ने बही पढ़ी तो मेघूदान  बाजी ने अमलों का रंग डेढ़ घंटे तक पढ़ा, इतने नाम मैंने पहले कभी नहीं सुने, बाजी की वाणी मेरी दीवारों से टकराती और खेतसिंग बा हरेक अमलों के दोहे के ख़त्म के बाद वाह बाजी,लख धिनकार बाजी  पढ़ते हुए कमीज़ बाजू पर  चढ़ाते जाते।तुम्हें उन नासेटूओं को शामिल करना होगा,जिनकी थकावट के पसीनों को मैंने डाखणे बायरिये से पों...
---पोथी -परख--- शाज़ी ज़मां की किताब 'अकबर' की समीक्षा.... अकबर के जीवन को इतिहास में जितना लिखा गया उतना ही साहित्य,संगीत, और दीन के मसलों में भी लिखा गया।अकबर अपने साथ एक साम्राज्य लेकर नहीं चल रहा था अकबर अपने साथ में इंसानियत और संजीदगी लेकर चल रहा था,जिसने दिल्ली,आगरा और फ़तहपुर सीकरी के दरवाज़ों को संतो,फ़कीरों,पादरी लोगों के लिए खोल रखा था।शाज़ी ज़मां का अकबर इतिहास के अकबर से अलग है, इतिहास का अकबर युद्धों और साम्राज्य विस्तार वाला व कूटनीतिक अकबर है,जबकि शाज़ी ज़मां का अकबर हरेक दीन (धर्म)की क़द्र करने वाला,संतों फ़कीरों व पादरियों की चर्चाएँ सुनने वाला,अपने दरबारियों से मित्रता रखने वाला,मित्रों की मौत पर होश खोकर आँखें बहाने वाला,पूरे कुनबे को संरक्षण देने वाला,गुस्से में भरे दरबार में गुनाहगार को गाली देने वाला,हरेक धर्म की अच्छाईयों पर तारीफ़ें पढ़ने वाला,बेझिझक होकर उन्हें अपनाने वाला,और अनेकों गुनाहगारों को क्षमा करने वाला अकबर है।शाज़ी ज़मां ने उपन्यास का स्वरूप देकर पाठकों को एक इतिहास के सदी चक्र को बड़े ही सुंदर ढ़ंग से पेश किया है,भेरा (पंजाब) में अकबर के सैनिक शिका...
कहानी----"मोणीगर रहो नी आज री रात" अब बरसाले के दिनों में रेत नहीं उङती। दखिणी पवनें शांत और सलील लहराते बाजरी के खेतों में सरसराहट की थपकी घोल कर कृषक के पृष्ठभाग की मालिश करते हुए अगले खेत की बाजरी को घुमेरा देकर चली जाती। मीनल का पति चेतन उससे कोसों दूर अधियारे खेत में डेरा डाले हुए था। अच्छी फसल की आश में पहले सूङ फिर बारिश का इंतज़ार और फिर बुवाई व रखवाली के दिन।  सावन की तीज पर मीनल को आश थी कि चेतन आएगा और इसी आशा को सुंदर बनाने के लिए मीनल ने स्वयं को सजाने की तमाम विधियों को अपना बना लिया, घर के खेत में सूङ करने से उसके शरीर पर लगे केर के कांटों के निशां उसने हल्दी से धो दिए।मेट से नरम किए रेशमी बालों को सास  माँ से गुंथाया। काजल की लकीरों से आँखों की शिल्पता को और बढ़ा दिया। विवाह की पोशाक में इत्र लगाकर उसे सिणगार में शामिल किया। नथ के बांकेपन को ठीक करके आईने में थोड़ी देर के लिए ताकती रही। उसे याद आया कि बिंदी तो भूल ही गई, सिणगार संदूक की तरफ लपककर लाल बिंदी को भाल के मध्य सजा दिया, बिंदी में पङा चमकीला निशां आईने से टकराकर उसके मुख पर पड़ने लगा और पुनः उ...
कहानी---"इश्क़ है दरिया जादू का"...... नेशनल हैंडलूम की सीढ़ियों पर विश्वजीत को वो दिखाई दिया जिसे उसकी आँखें हरेक आती जाती स्कूली ड्रेस में देखा करती थी। पर यह स्कूल ड्रेस नहीं थी यह केशर वरणी चुनरी ओढे उसकी निहारिका थी। "न.. नि... निहारिका ओ निहारिका ओ निहारिका....सीढियों के तले से निहारिका ने ऊपर देखा और पहली निगाह में ही पहचान लिया उसे। वह दौङकर उससे लिपटना चाहती थी पर हैंडलूम में कौतूहल होने के डर से वह मुस्कान बिखेर कर खङी रही। विश्वजीत सीढ़ियों से दौङकर उसके पास आकर कुछ कहने ही वाला था कि निहारिका ने उसे खींचकर आइस्क्रीम कार्नर की बगल में ले जाकर उसे अपने नंबर साझा किए और कैफे में मिलने का कहकर चल दी। निहारिका तुमने तीन दिन बिता दिए आने का कहकर पर आज भी तुम नहीं आई मैं पूरा दिन माॅम्स कैफे में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ। अरे विभू मैं आज नहीं आऊंगी सो सोरी विभू, हम अगले हफ्ते मिलेंगे। कहकर निहारिका ने फोन काट दिया। रेगिस्तां की पहाड़ियों के बीच एक शहर जो लू की लपटों को सहकर बङा हुआ है, विकास नाम के बैल से कई बार मार खाई, लेकिन संभलकर चलने का हुनर इसके कुछ अक्लमं...
कहानी----"जानकी से मोनालिसा तक" ..उसके चेहरे पर खरोंचों के दाग आज बीस दिन बाद उसने देखे थे, अस्पताल के ही शिशे में।होश भी आज ही आया था ,उसे नहीं पता कि दो बार कौमा में मौत उसके सर पर हाथ फेरकर लौरी सुना गई थी।मासूमियत उसके पोरों से रिसकर बड़े अस्पताली लिबास को भिगो रही थी, बाहर माँ गूसलखाने का दरवाज़ा रह रहकर बजा कर कह रही थी"बेटू बाहर आ रंजन के पिता आज जोधपुर से नया वकील लेकर आए हैं ।" मोनालिसा के आंसू आँखों के भींचने से और तेज हो गए ,हाथों की अंगुलियों को कसकर सर के दोनों तरफ़ पकड़कर फफकती रही।                    बाहर के शोरगुल से बेख़बर वह अपने भीतर चल रहे शोरगुल को रोक नहीं पा रही थी।घुटनों के बल बैठकर बालों को संवारने की नाकाम कोशिश की पर वे फिर बिखर गए।वह दीवार के सहारे चलकर खड़ी हुई तब तक बाहर का शोरगुल हो हल्ले में बदल गया,उसने आंसुओं को पोंछा और अंतर की फफकन को मुंह से लम्बी आहें भरकर कम किया और सहमी सी बाहर आकर माँ के पीछे खड़ी हो गई,बाहर पिताजी ने वकील को कुर्सी पर बिठाकर मोनालिसा को भी बिठा दिया,मोनालिसा का हाथ उसकी माँ ने थाम ...