---पोथी -परख---
शाज़ी ज़मां की किताब 'अकबर' की समीक्षा....

अकबर के जीवन को इतिहास में जितना लिखा गया उतना ही साहित्य,संगीत, और दीन के मसलों में भी लिखा गया।अकबर अपने साथ एक साम्राज्य लेकर नहीं चल रहा था अकबर अपने साथ में इंसानियत और संजीदगी लेकर चल रहा था,जिसने दिल्ली,आगरा और फ़तहपुर सीकरी के दरवाज़ों को संतो,फ़कीरों,पादरी लोगों के लिए खोल रखा था।शाज़ी ज़मां का अकबर इतिहास के अकबर से अलग है, इतिहास का अकबर युद्धों और साम्राज्य विस्तार वाला व कूटनीतिक अकबर है,जबकि शाज़ी ज़मां का अकबर हरेक दीन (धर्म)की क़द्र करने वाला,संतों फ़कीरों व पादरियों की चर्चाएँ सुनने वाला,अपने दरबारियों से मित्रता रखने वाला,मित्रों की मौत पर होश खोकर आँखें बहाने वाला,पूरे कुनबे को संरक्षण देने वाला,गुस्से में भरे दरबार में गुनाहगार को गाली देने वाला,हरेक धर्म की अच्छाईयों पर तारीफ़ें पढ़ने वाला,बेझिझक होकर उन्हें अपनाने वाला,और अनेकों गुनाहगारों को क्षमा करने वाला अकबर है।शाज़ी ज़मां ने उपन्यास का स्वरूप देकर पाठकों को एक इतिहास के सदी चक्र को बड़े ही सुंदर ढ़ंग से पेश किया है,भेरा (पंजाब) में अकबर के सैनिक शिकारी घेरे के डेरे में तुज़ुके बाबरी को ज़बां दी गई..1578 के समय से शुरु होती यह किताब बाबर के तैमूरी संबंधों को उजागर करती हुई हुमायूँ के संघर्षों की दास्ताँ सुनाती है।अकबर के जन्म और उनके ओजस्वी होने की भविष्यवाणियाँ चार पन्नों में लिखी गई,इतना ही नहीं अकबर ने किस मौके पर कौनसे वस्त्र पहने, किस सन् में वे यात्राओं पर गए-यह सारी बातें शाज़ी ज़मां के बीस बरसों के विस्तृत अध्ययन का हिस्सा है।किताब के पेज़ संख्या 221 की शीर्ष पंक्ति अकबर को सभी दीन से अलग स्थापित करती है जब दरबारी उन्हें अलग दीन का मसला पुछते अकबर कहता है"दीन की बात मुल्लों से पूछो।हम तो सिर्फ़ वही सुलझा सकते हैं जिसका ताल्लुक़ इंसान की अक़्ल से है।"यहाँ से उनके दीन-ए ईलाही का रुतबा चढ़ता नज़र आता है, जिसे ना तो जैन संत हरिसेन सूरी उतार पाए, ना ही पादरी रूडॉल्फ़ एकुआवीवा,फ्रांसिस हेन्रीक्स और ना ही अंतोनियो मोन्सेराते।लेकिन अकबर ने अपने दीवाने ख़ास में बाईबिल को भी उतनी ही शिद्दत से सुना जितना कुरान को।आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि महाभारत, रामायण और अन्य भारतीय ग्रंथों का फ़ारसी अनुवाद बँदायूनी के हाथों अकबर ने ही करवाया।जैन यात्रियों और अन्य तीर्थ यात्रियों की यात्राओं पर कर ख़त्म कर यात्रा सहयोग दिया जाने लगा,वृंदावन में स्वयं की देखरेख में कृष्ण मंदिर बनवाया।अकबर का दीन-ए-ईलाही इंसानियत की बुनियाद पर टिका था जिसमें सभी के मतों का क़द्र और अच्छाईयों को स्वीकारने का साहस था।अकबर के इसी रवैये ने फ़ारस के शाहों व ख़लीफ़ाओं ने कभी अकबर को अपने दीन का स्वीकार नहीं किया।अकबर गुणीजनों की क़द्र करने वाला था, किताब में हरेक नवरत्न पर पन्ने लिखे गए सबसे ज़्यादा ज़िक्र आमेर राजा मानसिंह,बीरबल,तानसेन और अबुल फ़ज़ल का है जिन्हें अकबर के विरोधी उलेमा अक्सर अलग ज़िस्म एक रूह की संज्ञा देते थे।अकबर के जीवन का अंतिम समय बड़ी कठिनाई से बीता उनके सारे दरबारी उनसे पहले उन्हें अलविदा कह गए तब दुखी मन ने कहा-
"पीथल सूं मजलिस गई,तानसेन सूं राग।
हंसबो, रमिबो,बोलबो, गयो बीरबर साथ।।
शाज़ी का अकबर यदि आज होता तो निश्चित ही उसकी एक राष्ट्र को प्रासंगिकता होती.....



---तेज़स...

Comments

  1. साहित्य जगत का उभरता अनमोल रत्न .... एक विषुद्ध और वास्तविकता को सरोकार करती समीक्षा लेकिन यह बात उन लोगो के कभी गले नही उतरेगी जो व्यक्ति विशेष को धर्म का प्रतिनिधि मानकर उसे उसी के समरूप व्यवहार करना उचित मानते हैं ... नासेटू एक कोई कवि नही,रचनाकार नही,समीक्षक नही ... वो तो एक जीता जागता भविष्य है जो वर्तमान के थपेड़ों को सहन करता हुआ उसे पोथी(साहित्य) की उन घटनाओं से रूबरू करवाता है जिनको हमने अपने प्रमस्तिक की गहराइयों में नकारात्मक रूप दे रखा है ...... शेष जारी ...

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  2. ऐसा कमाल का लिखा है आपने कि पढ़ते समय एक बार भी ले बाधित नहीं हुआ और भाव तो सीधे मन तक पहुंचे !!

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