गीत कविता-मन में रोज़ तुम्हारी सारी लाज़ दिखाई देती है....
उन लफ़्जों की बात बात में
साज सुनाई देती है
मन में रोज़ तुम्हारी सारी
लाज दिखाई देती है।।
जीवन था कुछ बिखरा उखङा
मजलिस में भी मौन खङा
ख़ामोश दिनों की बात कहीं
जो आज सुनाई देती है।
मन में रोज़ तुम्हारी सारी
लाज दिखाई देती है।।
आज दिलों के बंद दरवाजे
किस्से काज कहाँ है ताजे
बैठे थे तुम साथ मेरे वह
रात दिखाई देती है।
मन में रोज़ तुम्हारी सारी
लाज दिखाई देती है।।
ओ मेरी अय जगमग ज्योति
अंधियारे के उजला मोती
बात बात पर ख़्याल करे
वह आँख दिखाई देती है।
मन में रोज़ तुम्हारी सारी
लाज दिखाई देती है।।
अंतर के तुम ओम बने हो
विकल रागिनी व्योम बने हो
नवल गीत की रागों सी
मुस्कान दिखाई देती है।
मन में रोज़ तुम्हारी सारी
लाज दिखाई देती है।।
---तेज़स...
साज सुनाई देती है
मन में रोज़ तुम्हारी सारी
लाज दिखाई देती है।।
जीवन था कुछ बिखरा उखङा
मजलिस में भी मौन खङा
ख़ामोश दिनों की बात कहीं
जो आज सुनाई देती है।
मन में रोज़ तुम्हारी सारी
लाज दिखाई देती है।।
आज दिलों के बंद दरवाजे
किस्से काज कहाँ है ताजे
बैठे थे तुम साथ मेरे वह
रात दिखाई देती है।
मन में रोज़ तुम्हारी सारी
लाज दिखाई देती है।।
ओ मेरी अय जगमग ज्योति
अंधियारे के उजला मोती
बात बात पर ख़्याल करे
वह आँख दिखाई देती है।
मन में रोज़ तुम्हारी सारी
लाज दिखाई देती है।।
अंतर के तुम ओम बने हो
विकल रागिनी व्योम बने हो
नवल गीत की रागों सी
मुस्कान दिखाई देती है।
मन में रोज़ तुम्हारी सारी
लाज दिखाई देती है।।
---तेज़स...
आज मैं आपके ब्लॉग पर आया और ब्लोगिंग के माध्यम से आपको पढने का अवसर मिला
ReplyDeleteख़ुशी हुई.