कोटड़ी कलरव...(रेगिस्तान में मेहमानों के व पुरुषवर्ग के ठहरने की घर से अलग जगह)
कोटड़ी कलरव-1
मैंने मेरा सामर्थ्य इतना विशाल बना दिया कि मेरे "घड़े, चिलम के खीरे की धूणी, चारपाई के मथांतिये-पगांथिये,बाहर खड़े नीम की सरसराहट" आदि में हज़ारों पीड़ाओं को समेट लिया। मेरे संबंध में किसी ने कहा कि तेरे उपकारों के बदले मैं तुम्हें लिपिबद्ध करना चाहता हूँ, तब मैं बोली कि तू मात्र मुझे ही लिखेगा तो मेरे अन्य साथी नाराज़ हो जाएंगे, तुम्हें रियाण-रपाण में बैठकर ठहाके लगाने वालों को शामिल करना होगा, तुम्हें बेरियों की बरतें व चड़स सीलते अनेकों सींचारूओं को शामिल करना होगा,तुम्हें दीपावली के रामा-श्यामाओं और आखातीज के खीच और गुळराब को शामिल करना होगा।तुम तो बरस भर में एक दफ़े मिलने आते हो पिछली बार जब रावजी ने बही पढ़ी तो मेघूदान बाजी ने अमलों का रंग डेढ़ घंटे तक पढ़ा, इतने नाम मैंने पहले कभी नहीं सुने, बाजी की वाणी मेरी दीवारों से टकराती और खेतसिंग बा हरेक अमलों के दोहे के ख़त्म के बाद वाह बाजी,लख धिनकार बाजी पढ़ते हुए कमीज़ बाजू पर चढ़ाते जाते।तुम्हें उन नासेटूओं को शामिल करना होगा,जिनकी थकावट के पसीनों को मैंने डाखणे बायरिये से पोंछ दिया, उन्हें घी के चूरमे और माखण के आटे खिलाकर तृप्त किया।
कोटड़ी कहने लगी "तुम्हें लिखना हो तो इन सभी को साथ लेकर लिखना,मैं अकेली भला क्या हूँ,मुझे नहीं पता कि ज़मीं के इस टुकड़े में ऐसा क्या है कि प्राणहीन पत्थरों और खूँटों के झोंपड़ो से भी स्नेह करते हैं।पिछले बरसाले जब चाँदाराम ने पड़ोस के कुम्हारों का ऊंट मार दिया तो तीन दिन तक मैं बहसों और तर्कों को सुन-सुन कर अधीर हो चुकी थी,तीन दिनों बाद राजीनामा किया गया और अमलों के खोबे एक दूसरे को दिये उसी वक़्त के स्नेह ने मुझे भी सुकूँ दिया।सच्च पूछो तो ऐसी कितनी ही तकरारें मैं पिछले कई सौ बरसों से सुनती आ रही हूँ, ठा सा रायसिंग ने मुझे कभी अकेला नहीं किया, उनके जीसा अचलसिंग तो अपने साथी मानजी कोटड़िये के साथ पूरा दिन चिलम फूँक-फूँक कर ठहाके लगाते और मुझे कभी सूना नहीं किया।मैं भी अचलसिंग को रात में लोरी सुनाने का प्रपंच करके अपनी चारपाईयों के पागों में भँवरों को गुँजन करने का कहती।यह मेरी अलग-अलग खूँटी देख रहे हो,एक थेली में चिलम का जर्दा है, यह देरावर सिंग गुजरात गए तब लाए थे, कैसा नशा था इसका कि रायसिंग ने कभी इसे दूसरे के हाथों नहीं दिया,मैं देखा करती थी रायसिंग,राणजी पुरोहित व कूंपजी बा मेरे चुल्हे पर बैठकर चिलम की फूँकें भर-भर के रानी रूपांदे के लालर बनने तक की यात्रा सुनाते,राणजी पुरोहित की घोड़ी अपने घर से कई बार दौड़ कर मुझ तक आती कि कहीं दूसरी जगह राणजी मिले ना मिले इस बड़भागण के पास ज़रूर होंगे, राणजी कूंपजी को यह कहकर हँसते रहते कि इस भटारी को भी यहाँ आने का रोग लग गया तभी तेखल तुड़ाकर चली आती है।
दूसरी खूँटी में अमल की कोथली है,मेरी दीवारों के हाथ कुदरत ने दिये होते तो मैं इस अमल की पोटली को मीठी सहलाहट देती पूछना चाहोगे क्यूँ....इसने जितने राजीनामे अपने कोणों में फँसे अमल डळियों से किये वह मैं सदैव स्मरण में रखती हूँ।हमीरा खाँ जब भी कमायचा लेकर गाता हुआ आता तो मेरा मन कहता कुदरत ने मेरी नींव में पैर भरे होते तो मैं हमीरे की धुन पर थिरक कर उसका स्वागत करती,खैर हमीरा विड़द वखाण करके कमायचे पर फेरता नथ को और मैं मदमस्त होकर सुनती रहती।......क्रमशः....
कोटड़ी कलरव-2
कोटड़ी यह भी कहना चाहती थी कि विश्व के इतने सारे समुदाय व लोग है, कोटड़ी की रीत इस रेगिस्तान ने ही पाली।इसे कोटड़ी का स्वाभिमान कहें या यहाँ के उजले वाशिंदों के प्रति उसकी कृतज्ञ परायणता पर कुछ था ज़रूर जो यहाँ के वाशिंदों और कोटड़ी को एक-दूसरे में जोड़ता था।कोटड़ी परंपरा ने अपना स्वरूप बदल दिया,समय ने उन्हें कभी चंवरे का नाम दिया, तो कभी गुडाळ का।संपदाओं में विस्तार हुआ तो कोटड़ी में भी परिवर्तन हुआ और पत्थरों के गोल आकार में उसका नाम रखा गया -"बुर्ज"। पिछली बार जब देरावरसिंग गुजरात गए तो रायसिंग ने उन्हें कहा था कि ऊंझा शहर की लोहे की चारपाई मज़बूत बताते हैं पाँच चारपाई लेते आना, एक बड़ी पीतल की देग भी लेते आना, हर बार मेहमान बढ़ने पर देग किसी दूसरे की माँग लानी पड़ती है।चारपाई की नवार बुनावट के युग से पहले का दौर मैंने देखा, पूरा दिन सूनी नाण में घुमेरा देते तब जाकर आक की सूखी लकड़ियों की छाल निकालते उन्हें "अंकाला"(आक से प्रदत्त) कहने लगे।अंकाले की गोटियाँ बुनी जाती उसे किसी चिताळ(चिकना पत्थर) पर रखकर खूब कूटा जाता जिससे उसके रेशे नरम व मज़बूत हो जाया करते, उन कूटे हुए गोटों को भिगोया जाता और फिर कूटा जाता,जब छांग को हेरने के दिन आते तो सूनी नाणों में हरेक कोई अंकाले की बेवड़(दो छोर वाली) गूँथता नज़र आता.....इतने प्रयासों के उपरांत उसे कातकर संग्रह में रख लिया जाता।
अभी चारपाई की बुनाई में कईयों काम अधूरे थे, जो यह बताते थे कि जीवन की शैली चुनौतियां पेश करे और भयंकर अकाळ झेलते हुए भी स्वयं को कभी कमज़ोर ना पड़ने दे उसी तपत का दूसरा नाम रेगिस्तान का वाशिंदा होना है।रोहिड़ा के काटे हुए लठ्ठे से चारपाई के ईश,ऊपळ व पागे तैयार होते।हरलाल बा उसे ऐसा जोड़ते कि छह-सात आदमी भले आराम से बैठे वह नहीं टूटता था।....
उसी काते हुए अंकाले से चारपाई को बुनने का सिलसिला शुरू होता गुरड़ भुज,चौकड़ी, आदि उन्हें बुनने के प्रकार होते थे।कोटड़ी जिस किसी रेगिस्तानी घर के आगे रही उसमें चारपाई कभी नदारद नहीं पाई गई। कई रातों उस पर सोते-सोते नासेटू अपनी थकानों को उस चारपाई के हवाले कर लेते।इन्हीं अंकाले की चारपाई से कोटड़ी की दीवारों ने सिंध देश के अनेकों गऊ चोरों व स्त्री हरण कर्ताओं के नाम सुने,उसी की वार में गए अनेकों भोमिया हो गए बाँकुरों के नाम भी सुने।अचलसिंग का मित्र मानजी जब भी मोतीसिंग के भोमिया कहानी सुनाते-सुनाते मूंछ में रवानियत भर देते थे तो चिलमों की फूँक के साथ शब्द डणकार कर बाहर आते,अचलसिंग चारपाई की सुस्ती छोड़ मानजी के पास बैठ जाता और ज्यूँ ही एक वाक्य पूरा होता,जोर से "बाह मानजी, जै मोतीसिंग" कहते जाते।मानजी जब इन छोटे संघर्षों के किस्सों को रोब से सुना रहे होते तो मेरी भी आँखें लाल हो जाती,मुझे यदि आंचल का गौरव विधाता ने दिया होता तो मैं ऐसे जोशीले मानसिंगों को अपने हाथों चूरमे करके,सर पर हाथ फेरकर जीमाती।........
अभी चारपाई की बुनाई में कईयों काम अधूरे थे, जो यह बताते थे कि जीवन की शैली चुनौतियां पेश करे और भयंकर अकाळ झेलते हुए भी स्वयं को कभी कमज़ोर ना पड़ने दे उसी तपत का दूसरा नाम रेगिस्तान का वाशिंदा होना है।रोहिड़ा के काटे हुए लठ्ठे से चारपाई के ईश,ऊपळ व पागे तैयार होते।हरलाल बा उसे ऐसा जोड़ते कि छह-सात आदमी भले आराम से बैठे वह नहीं टूटता था।....
उसी काते हुए अंकाले से चारपाई को बुनने का सिलसिला शुरू होता गुरड़ भुज,चौकड़ी, आदि उन्हें बुनने के प्रकार होते थे।कोटड़ी जिस किसी रेगिस्तानी घर के आगे रही उसमें चारपाई कभी नदारद नहीं पाई गई। कई रातों उस पर सोते-सोते नासेटू अपनी थकानों को उस चारपाई के हवाले कर लेते।इन्हीं अंकाले की चारपाई से कोटड़ी की दीवारों ने सिंध देश के अनेकों गऊ चोरों व स्त्री हरण कर्ताओं के नाम सुने,उसी की वार में गए अनेकों भोमिया हो गए बाँकुरों के नाम भी सुने।अचलसिंग का मित्र मानजी जब भी मोतीसिंग के भोमिया कहानी सुनाते-सुनाते मूंछ में रवानियत भर देते थे तो चिलमों की फूँक के साथ शब्द डणकार कर बाहर आते,अचलसिंग चारपाई की सुस्ती छोड़ मानजी के पास बैठ जाता और ज्यूँ ही एक वाक्य पूरा होता,जोर से "बाह मानजी, जै मोतीसिंग" कहते जाते।मानजी जब इन छोटे संघर्षों के किस्सों को रोब से सुना रहे होते तो मेरी भी आँखें लाल हो जाती,मुझे यदि आंचल का गौरव विधाता ने दिया होता तो मैं ऐसे जोशीले मानसिंगों को अपने हाथों चूरमे करके,सर पर हाथ फेरकर जीमाती।........
कोटड़ी कलरव-3
स्पेन में एक फेस्टिवल विश्व प्रसिद्ध हुआ और उसका नाम रखा गया "ला टोमाटिना"।हज़ारों टन टमाटर गलियों में लाए जाते हैं और उसे एक दूसरे पर बरसाया जाता है।विश्व के मोस्ट हेप्पीनेस देशों की तालिका में स्पेन का अग्रणी स्थान रहा, जब वहाँ की खुशी सुचकांक उच्चता का कारण पता किया गया तो उसका एक कारण स्पेन के फेस्टिवल रहे।
रेगिस्तान के पास खुशी पाने के कृत्रिम कारण थे भी नहीं, लेकिन आखातीज के पर्व पर छोटे बच्चे गाँव की हरेक कोटड़ी जाते हैं और वहाँ बैठे लोगों के ऊपर बाजरी, तिल,मूँग के बीजों की बारिशें करते,हरेक कोटड़ी में उन बच्चों के आने का इंतज़ार रहता और हाथ में घंडी(घंटी) को बजाते बच्चे कोटड़ी दर कोटड़ी जाते हैं, उन्हें अमल की छोटी मनुहार के बाद बाजरी के खीच और गुळराबों की मनुहार होती है। स्पेन की संपन्नता से उपजी उदासीनता उन्हें उनके फेस्टिवल से जोड़ती है जबकि रेगिस्तान अपनी खुशी में भविष्य ढूँढ़ता हुआ स्नेहों की मनुहारें पढ़ता है।इसी अपणायत की आखातीजों ने रेगिस्तान को कभी उदासीन नहीं रहने दिया।व्यक्ति का समेष्ठीगत होकर दुख-दर्दों को साझा करना ह्युमन इथिकनेस की एक सीढ़ी माना जाता है, अनपढ़ और अनजान कहे जाने वाले रेगिस्तानी की कोटड़ी में इसी ह्युमन इथिकनेस को बिना समझे चरितार्थ किया जाता रहा।
कोटड़ी की दहलीज़ ने कई अनजाने राहियों को शरण दी और तपती दुपहरियों में ठंडी छाछ व रातों में ब्यालू(शाम का भोजन) की तहज़ीब ज़िंदा रखी।अनजाने राहगीर को उसका परिचय बाद में पूछा जाता और भोजन-पानी पहले।विश्व के किसी भूभाग में ऐसी कोटड़ी इथिकनेस दिखे तो ज़रूर बताना जहाँ दुखते पगों को विश्राम और,भूखी अंतड़ियों को ब्यालू के थोरे(मनुहार) चलते हैं।कोटड़ी के अस्तित्व ख़त्म हो गए और उसकी जगह आज के फॉर्म हाऊस कल्चर ने ले ली, लेकिन जो जाजम की कद्र कोटड़ी में पाली जाती,वह फॉर्म हाऊस के सोफों में कहाँ नज़र आएगी।
एक होता है अभाव और एक होता है मानसिक अभाव।कोटड़ी के धणी अभावों में होते हुए भी अपनी कोटड़ी से किसी को भूखा नहीं जाने देते और "मेह(बारिशें) अर मेहमान कद कद आसी" की पंक्तियाँ पढ़कर आवभगत के आग्रह पढ़ते रहते।मानसिक अभाव में जीवन के नज़ारे शहर के जीवन में देखे जाते हैं, जहाँ "जोय ऑफ गिविंग"(दान का सुख) के मंत्र पढ़े जाते हैं और घर के दरवाज़े से भूखों को रोटी नसीब नहीं होती, पढ़े लिखे और संपन्न लोग कोटड़ी के धणियों से मात खाकर मानसिक अभावों में ही रहते हैं और कोटड़ी के धणी अभावों में रहते हुए भी दरियादिली व "स्वतः पली जोय ऑफ गिविंग" को चरितार्थ करते हैं।
रेगिस्तान के पास खुशी पाने के कृत्रिम कारण थे भी नहीं, लेकिन आखातीज के पर्व पर छोटे बच्चे गाँव की हरेक कोटड़ी जाते हैं और वहाँ बैठे लोगों के ऊपर बाजरी, तिल,मूँग के बीजों की बारिशें करते,हरेक कोटड़ी में उन बच्चों के आने का इंतज़ार रहता और हाथ में घंडी(घंटी) को बजाते बच्चे कोटड़ी दर कोटड़ी जाते हैं, उन्हें अमल की छोटी मनुहार के बाद बाजरी के खीच और गुळराबों की मनुहार होती है। स्पेन की संपन्नता से उपजी उदासीनता उन्हें उनके फेस्टिवल से जोड़ती है जबकि रेगिस्तान अपनी खुशी में भविष्य ढूँढ़ता हुआ स्नेहों की मनुहारें पढ़ता है।इसी अपणायत की आखातीजों ने रेगिस्तान को कभी उदासीन नहीं रहने दिया।व्यक्ति का समेष्ठीगत होकर दुख-दर्दों को साझा करना ह्युमन इथिकनेस की एक सीढ़ी माना जाता है, अनपढ़ और अनजान कहे जाने वाले रेगिस्तानी की कोटड़ी में इसी ह्युमन इथिकनेस को बिना समझे चरितार्थ किया जाता रहा।
कोटड़ी की दहलीज़ ने कई अनजाने राहियों को शरण दी और तपती दुपहरियों में ठंडी छाछ व रातों में ब्यालू(शाम का भोजन) की तहज़ीब ज़िंदा रखी।अनजाने राहगीर को उसका परिचय बाद में पूछा जाता और भोजन-पानी पहले।विश्व के किसी भूभाग में ऐसी कोटड़ी इथिकनेस दिखे तो ज़रूर बताना जहाँ दुखते पगों को विश्राम और,भूखी अंतड़ियों को ब्यालू के थोरे(मनुहार) चलते हैं।कोटड़ी के अस्तित्व ख़त्म हो गए और उसकी जगह आज के फॉर्म हाऊस कल्चर ने ले ली, लेकिन जो जाजम की कद्र कोटड़ी में पाली जाती,वह फॉर्म हाऊस के सोफों में कहाँ नज़र आएगी।
एक होता है अभाव और एक होता है मानसिक अभाव।कोटड़ी के धणी अभावों में होते हुए भी अपनी कोटड़ी से किसी को भूखा नहीं जाने देते और "मेह(बारिशें) अर मेहमान कद कद आसी" की पंक्तियाँ पढ़कर आवभगत के आग्रह पढ़ते रहते।मानसिक अभाव में जीवन के नज़ारे शहर के जीवन में देखे जाते हैं, जहाँ "जोय ऑफ गिविंग"(दान का सुख) के मंत्र पढ़े जाते हैं और घर के दरवाज़े से भूखों को रोटी नसीब नहीं होती, पढ़े लिखे और संपन्न लोग कोटड़ी के धणियों से मात खाकर मानसिक अभावों में ही रहते हैं और कोटड़ी के धणी अभावों में रहते हुए भी दरियादिली व "स्वतः पली जोय ऑफ गिविंग" को चरितार्थ करते हैं।
नासेटू भारत में दो जगह ही पाए जाते हैं, एक तो रेगिस्तान की ज़मीं पर और दूसरे कश्मीर की वेली में।कश्मीर के नासेटू अपने खोए हुए खच्चरों और कश्मीरी भेड़ों को खोजने जाते हैं तो रेगिस्तान के वाशिंदे अपनी ऊंटो, गायों और बकरियों की नासेट में जाते हैं।एक खेतीहर रेगिस्तानी को कोई भटकाव नहीं होता लेकिन रेगिस्तान का हरेक खेतीहर नासेटू होता है।नासेटू जब भी विस्तृत फैले धोरा-धरती में आँधियों के थपेड़े झेलते ढूँढते रहते हैं अपने खोए पशुओं को, कश्मीर में नासेटू बर्फ की मार झेलते हैं, उनके खच्चर पहाड़ों की घाटियों में गुम होते तो ढूँढना मुश्किल और रेगिस्तान के ऊंट सूनी नाणों में खो जाते तो धूल भरी आँधियों से पैर ढूँढने की आफतें और ना कोई पानी के स्त्रोत और ना कोई रोटी के वसीले।ऐसे समय सूने रेत के समंदर में कोटड़ी नासेटूओं की शरण दायिनी बन जाती,बडेरे चिलमें फूँकते हुए कहते जाते घर आए नासेटू को अंजळ(भोजन पानी) करवाना पुण्यमयी है।इसी भलावण को पीढ़ी दर पीढ़ी पाला जाता और कोटड़ी की दहलीज़ से कोई नासेटू किसी भी गाँव या जाति का हो भूखा-प्यासा नहीं जाता।नासेटू पढ़ते जाते मीठी दुआएं और तृप्त चेहरों में भर आती निश्छल मनुहारें और कोटड़ियाँ धन्य मानती स्वयं को।ऐसा ह्युमन इथिकनेस रेगिस्तान की एक कोटड़ी से ही पैदा होता था, जिसमें स्वार्थों के परे परपीड़ा को कंठ से लगाकर ख़त्म किया जाता था।एक-दूसरे के भीतरी आँसू पोंछने का तरीका रेगिस्तान की कोटड़ी से बेहतर कौन जानता था, यही तरीका कोटड़ी का सूफ़ी अज़ानों की मानिंंद उजला और पाक़दिल था....क्रमशः....
"कोटड़ी कलरव"- 4
कोटड़ी की नींव का सींचण किसी अन्य पदार्थ से ना होकर लोक साहित्य के पावन गारे से हुआ।वेदों को अपौरुषेय कहा गया।अच्छा जब वेद अपौरुषेय माने गए तो तीन हज़ार बरस बीत जाने के उपरांत ज़िंदा कैसे रह गए? इससे भी ख़ास बात कि आख्यान आधारित लोक कथाएं जो शताब्दियों उपरांत जीवित है उसका कारण?....श्रुति वार्ता का महत्त्व हम कैसे विस्मृत कर सकते हैं,जिसके बूते इतने महान ग्रंथों को जीवित रखा गया।शायर इक़बाल ने जब यह कहा कि -
"यूनान मिश्र रोमन, सब मिट गए जहां से।बाकी मगर है अब तक, नामो निशां हमारा।कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
,सदियों रहा है दुश्मन, दौर ए जहां हमारा।।
जब इक़बाल की इसी बात को ऊपर के प्रश्न चिह्नों से जोड़ा जाय तो इक़बाल की पंक्तियों को भी वही प्रश्न पूछा जाएगा कि वह कौनसा पक्ष था जिसके आधार पर उसने कहा कि हम मिटे नहीं और मिश्र व यूनानी सभ्यताएं ख़त्म हो गईं।अब उसके ख़त्म ना होने का श्रेय उन ज़बानों को देना होगा जिन्होंने लोक वार्ताओं के माध्यम से अपौरूषेय को पौरुषेय बना दिया था। दंतकथाओं के चलते पूरे भारत-वर्ष का लोक-साहित्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुना और भणा गया।उसी लोक साहित्य को,उसी श्रुति परंपरा को यदि .." आज भी ज़िंदा रखने की कोशिश किसी जगह पर की जा रही है जिसका नाम कोटड़ी के सभास्थल है,जिसने अपने हज़ारों बरसों का संबंध , समझ , घटनाक्रम तथा घटनाओं को विस्मृत नहीं किया। क्या यह प्रश्न भी ज़ायज़ नहीं है कि आज श्रुति परंपरा ख़त्म हो गई सुनने,सुनाने के दौर ख़त्म हो गए क्योंकि उन आख्यान कथाओं के माध्यम से बूढ़े शरीरों ने अपनी अग्र पीढ़ी को अपनी विरासत की सबसे खूबसूरत दौलत "इथिकनेस" को हवाले किया था।इतिहास लेखन की दो धाराएं आज़ादी से पहले भी रहीं और आज़ादी के बाद भी इतिहास लेखन की दो धाराएं रहीं।एक वो धारा जिसने सत्ता का इतिहास रचा और एक वह आख्यानक स्वरूप जो राव-भाटों की बहियों में समाया है।जिन्हें अपने पिछले से कोई मतलब नहीं रहता वह यह भी उम्मीद ना रखे कि मेरा अगला मेरा स्मरण रखेगा या विसंगति के विस्मृति बस्ते में डाल दिया जाएगा।
पोंइटेड.....
कोटड़ी का आख्यानक कह रहा है कि समझदार और एडवांस कहे जाने वाले मैकाले के अग्रजों ने उनके क़ब्रगाहों को सजा-सँवार कर टूरिस्ट स्पॉट में बदल दिया और पाश्चात्य पाद अनुसरण के चलते भारत के वाशिंदे अपने श्मशानों को फटे मुँह से देखकर अपने पिछलों की राख को भी संरक्षित रखने को ज़ायज़ नहीं ठहराते हैं।
कोटड़ी ने देखा कि जब उन्नत मानवता का पैमाना परोपकारों से छिपा हुआ है तो फिर यह संग्रहण के नुस्ख़े कौन सिखा रहा है।रेगिस्तान की कोटड़ी तो गाती रही कि-
कोटड़ी का आख्यानक कह रहा है कि समझदार और एडवांस कहे जाने वाले मैकाले के अग्रजों ने उनके क़ब्रगाहों को सजा-सँवार कर टूरिस्ट स्पॉट में बदल दिया और पाश्चात्य पाद अनुसरण के चलते भारत के वाशिंदे अपने श्मशानों को फटे मुँह से देखकर अपने पिछलों की राख को भी संरक्षित रखने को ज़ायज़ नहीं ठहराते हैं।
कोटड़ी ने देखा कि जब उन्नत मानवता का पैमाना परोपकारों से छिपा हुआ है तो फिर यह संग्रहण के नुस्ख़े कौन सिखा रहा है।रेगिस्तान की कोटड़ी तो गाती रही कि-
"सांई इतना दीजिए,जामै कुटंब समाय।
कोटड़ी को भय है कि श्रुति परंपरा का मरण मेरे मरण के साथ ही हो जाएगा,एक वह दौर जिस वक़्त वार्ताओं का लंबा दौर चलता और बूढ़े होठों से लोक जन के देशज किस्से सिखाए और कई लोक पूज्यों को ज़िंदा रखने का पुनित प्रयास हुआ।अनेकों रामदेवों को कंठों से गाया, अनेकों मीराओं का गोविंद विचरण करता रहा ढ़ांणी दर ढ़ांणी और हरजसों की रागें जीमाती रही कर्मा बाई के खीच।कोटड़ी ने पाबू और गोगाओं के पैमाने सिखाए,कोटड़ी ने ही सिखाया मातृसत्ता का महत्त्व।कोटड़ी कहती रहती श्रुतियाँ और बिना खर्च के एक पीढ़ी की तत्त्व मिमांसा स्थापित हो जाती अगली पीढ़ी में।अच्छा यह कोटड़ी का ही दर्द है कि श्रुति परंपरा को जो लोग गंदला और बासी बता रहे हैं और तथ्यपरखता पर यक़ीन करने की बात करते हैं, उन्हीं एडवांस लोगों ने श्रुति परंपरा की रामायणों और महाभारतों को परदों पर फ़िल्माया और आगे और भी तेज़ गति से काम ज़ारी है।कोटड़ी चिल्लाकर अपने लोगों को कह रही है कि मैं तुम्हारे तहज़ीबों की संरक्षिका होकर तुम्हें कह रही हूँ कि यह सारे एडवांस कहे जाने वाले लोग एक विशेष अनुसरण फोबिया के शिकार हैं,लेकिन तुम्हें यह बात समझनी होगी कि जिन बातों के विरोध में जिस कंठ से स्वर निकलता है उसी कंठ से उन बातों का प्रशंसा पत्र केवल अर्थोपार्जन के लिए किया जाता है।
कोटड़ी की सुबहें......
यहाँ कोई राग-विराग और रुद्धता के बंधन नहीं होते हैं।चिलम वाले चुल्हे में खीरा जलता रहता है और खीरे के मंद होते-होते सूरज अपनी कांखन झिड़कता धोरे के पीछे से दुबकता हुआ उठ बैठता है।चिलमें झटक कर पानी से हाथ धोकर सुबह की मालाएं फेरी जाती है।कोटड़ी की बारी से मीरा की प्रभातियाँ और कानूड़ा के हरजस की आवाज़ें बाहर आकर ख़ामोश आकड़ों व केरों में पसर जाती है।मंद पड़ते अंधेरे में गाय के दूध की धार के बर्तन में गिरने तक का स्वर स्पष्ट सुनाई देता है।छांगों के बाड़े में मेमने अपनी गर्दनें नीचे किये ऊन पर लगी मींगणी झिड़कते हुए अपनी-अपनी मां से मिलने को लेकर मिमियाते रहते हैं।ऊंट अपनी खूंटे से बँधा हुआ देखता है ठाण की ओडी की तरफ़ व झेराती हुई धोरे पर खड़ी सांढ़ को प्रत्युत्तर में लंबी झेराण देता हुआ अपनी लंबी गर्दन पसर देता है ज़मीं पर।कोटड़ी में चिलम की फूंक के धुएं के साथ ईसरदासों की अष्टपदवी गूँजती रहती है कोटड़ी की दीवारों से,चिलम के धुएं के साथ घर के चंवरों में चाय को चढ़ी देगड़ी का मोईरा धुआं बनकर पसर जाता है चंवरे के ऊपर।सूरज की निश्छलता में रात का पाप धीरे-धीरे छंटता जाता है ज़मीं के पार,वह ऐसा ही लगता है जैसे रात कोई कब्रगाह हो और दिन उसका मुर्दा जो अपने ताबूत की मिट्टी स्वयं अपने हाथों से हटाकर खड़ा होना चाहता हो।
तीतर अपने पंख फड़फड़ाता हुआ केर के कांटों में उलझा जगाता रहता है सूरज का अधिवक्ता बनकर।कोटड़ी के नीम की डाल-डाल पर चिड़ियाएं शोर के साथ मासूम बच्चे की भांति जगाती रहती है पूरे नीम को।छांग के बाड़े की टोकरी वाला बकरा गले को खूंटे पर रगड़ता है और टोकरी की आवाज़ें सूरज की किरणों से टकरा कर सचेत करती रहती है पूरी ढ़ांणी को।कोटड़ी के ओटे पर पींचे अपने चुगे का इंतज़ार करते हुए नहाते रहते रेत में और कच्चे केरों को अधखाया करके बिखेरते रहते हैं पूरे ओटे पर।चिलम वाला अपनी प्रभातियाँ पढ़ता-पढ़ता दाने की तासली अपनी चांदी अंगूठी से बजाता कबो-कबो के शोर से दाने बिखेरता जाता है कोटड़ी के ओटे पर।घर के आंगन में बिलौने के नेतर कड़ियों से जुड़कर नेहड़ी का हाथ थामे होली के स्वरों को अपने भीतर पिरोकर गाता रहता है मथने की राग।सूरज अपने को धोरे के ऊपर पाता है मुस्काता हुआ और बाड़े की बकरियाँ मिमियाती हुई धोरों के उस पार चली जाती है।कोटड़ी के ओटे पर चिलम वाला गाठ और दही के मिश्रण में अंगुलियां घुमाता देखता रहता है तीतरों की रपट जो कभी केर में चली जाती हैं तो कभी आकड़े में।गायें अपने थनों को खाली करने के बाद चाटती रहती है बछड़ी का गला और पूंछ से उड़ाती रहती है अपने ऊपर बैठी मख को।कुड़ की ओहरी से मासूम का मंद रुदन तोड़ता है घर की चुप्पी को और उसे स्नेह से लेने आगे हो जाते हैं दही को मंथने वाले हाथ।
यह सबकुछ इतनी नीरवता में घटता है जैसे रात के बसेरे को सुबह में किसी भय से खाली करना है।कोटड़ी का हरेक हिस्सा बूढ़ी आँख के ज्यूं निहारता रहता है इन सबको यह सोचकर कि इतना शांत व धीमा संसार गतिमान होता होगा ज़मीं के किसी और हिस्से पर।जहाँ महज़ मौन के कुछ नहीं पसरा हुआ हो।एकांत ही एकांत से बतियाता रहे घंटों और शोर-शराबे से कोसों दूर ज़िंदगी रीतती चली जाती है नीरवता में।चिलमें फिर चढ़ती है होठों पर और रेगिस्तां का कण-कण तपकर गाता रहता है संघर्षों की अंतहीन गाथा।
तीतर अपने पंख फड़फड़ाता हुआ केर के कांटों में उलझा जगाता रहता है सूरज का अधिवक्ता बनकर।कोटड़ी के नीम की डाल-डाल पर चिड़ियाएं शोर के साथ मासूम बच्चे की भांति जगाती रहती है पूरे नीम को।छांग के बाड़े की टोकरी वाला बकरा गले को खूंटे पर रगड़ता है और टोकरी की आवाज़ें सूरज की किरणों से टकरा कर सचेत करती रहती है पूरी ढ़ांणी को।कोटड़ी के ओटे पर पींचे अपने चुगे का इंतज़ार करते हुए नहाते रहते रेत में और कच्चे केरों को अधखाया करके बिखेरते रहते हैं पूरे ओटे पर।चिलम वाला अपनी प्रभातियाँ पढ़ता-पढ़ता दाने की तासली अपनी चांदी अंगूठी से बजाता कबो-कबो के शोर से दाने बिखेरता जाता है कोटड़ी के ओटे पर।घर के आंगन में बिलौने के नेतर कड़ियों से जुड़कर नेहड़ी का हाथ थामे होली के स्वरों को अपने भीतर पिरोकर गाता रहता है मथने की राग।सूरज अपने को धोरे के ऊपर पाता है मुस्काता हुआ और बाड़े की बकरियाँ मिमियाती हुई धोरों के उस पार चली जाती है।कोटड़ी के ओटे पर चिलम वाला गाठ और दही के मिश्रण में अंगुलियां घुमाता देखता रहता है तीतरों की रपट जो कभी केर में चली जाती हैं तो कभी आकड़े में।गायें अपने थनों को खाली करने के बाद चाटती रहती है बछड़ी का गला और पूंछ से उड़ाती रहती है अपने ऊपर बैठी मख को।कुड़ की ओहरी से मासूम का मंद रुदन तोड़ता है घर की चुप्पी को और उसे स्नेह से लेने आगे हो जाते हैं दही को मंथने वाले हाथ।
यह सबकुछ इतनी नीरवता में घटता है जैसे रात के बसेरे को सुबह में किसी भय से खाली करना है।कोटड़ी का हरेक हिस्सा बूढ़ी आँख के ज्यूं निहारता रहता है इन सबको यह सोचकर कि इतना शांत व धीमा संसार गतिमान होता होगा ज़मीं के किसी और हिस्से पर।जहाँ महज़ मौन के कुछ नहीं पसरा हुआ हो।एकांत ही एकांत से बतियाता रहे घंटों और शोर-शराबे से कोसों दूर ज़िंदगी रीतती चली जाती है नीरवता में।चिलमें फिर चढ़ती है होठों पर और रेगिस्तां का कण-कण तपकर गाता रहता है संघर्षों की अंतहीन गाथा।
कोटड़ी कलरव-6
प्रत री मनुहारां.....
किसी जगह विशेष के रहवासियों के मन के उजलेपन का पैमाना क्या होना चाहिए ?इसके दो मापदंड रखे जा सकते हैं, एक कि जो अपने घरों में कैद होकर अपने दैनिक उपक्रमों में सिमटे रहे, दूसरे वे जो अपने हृदयों में पराई पीड़ाओं को जगह देता चले और स्नेह की पाटी पढ़ता चले।रेगिस्तां के रहवासी उजले हैं या नहीं,यह तो ख़बर नहीं,लेकिन रेगिस्तां मापदंड के दूसरे नियम का बखूबी पालन करता है।कोटड़ी की दीवारें जब भी मेहमानों को देखती,हरख कर अगवानी करने खड़ी हो जाती।उसने कभी अपने धणियों को अतिथियों के आगमन पर नदारद नहीं देखा।कोटड़ी के ओटे पर ही जुहार के शब्द पढ़े जाते और स्नेहिलताएं एक-दूसरे की भाकरों में समाकर पढ़ती रहती रेगिस्तां की अपणायतों को।चिलमों के धुएं के साथ राजी-खुशी के समाचारों से लेकर शुरु हुई वार्ताएं घंटों बिता देती थी।
एक दफ़े तपती धूप में अलवर की मीणा मास्टराणी गाँव की स्कूल में पढ़ाने आई लेकिन शहर से आवागमन नहीं होने पर गाँव में ही रुक गई।मैंने जब नये मुल्क़ में मन लगने का पूछा तो वह हँसकर कहने लगी कि" यहाँ के लोग गॉसिप ज़्यादा करते हैं और पकाते बहुत है।मेरे पापा बैंक ऑफीसर हैं, भैया-भाभी जयपुर रहते हैं,सब अपने में मग्न हैं, कोई चिंता नहीं।"
मैंने उनकी तुलना को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया लेकिन दो साल पश्चात् जब उनका ट्रांसफर किसी अन्य जगह हुआ तो विदा के वक़्त मैंने उन्हें दो सालों का अनुभव पूछा तो वे बच्चों के सामने ही कहने लगीं कि "रेगिस्तान में नया आदमी आते हुए भी रोता हुआ आता है और जाते हुए भी रोता हुआ विदा लेता है।" यह अवधारणा मास्टरणी जी कहाँ से लाए ख़बर नहीं लेकिन मेरी भाभू ने उन्हें छाछ की बोतल और दूध की केतली पहुंचाना कभी बंद नहीं किया।मैं जब घर को जाता तो कुछ वाक्य उनके मुंह से सुनता रहता "बहन जी को ग्वार की फली पहुंचानी है, बहन जी को सांगरी पहुंचानी है, बहन जी को सूखी काचरी पहुंचानी है।" मुझे आज उन मास्टरणी जी को कहने में कोई गुरेज़ नहीं कि बेशक हमारी गॉसिप यूँ ही बनी रहे ताकि रेगिस्ताँ की पावन तहज़ीब बनी रहे।इस तकनीकी के दौर में भी आदमी दूसरे आदमी से घंटों तक बतियाता रहे,आप अपनी भौतिक ज़रूरतों का नृत्य करना,हमारा रेगिस्ताँ रूड़ी रीतों को पालता हुआ अपणायतों का नृत्य रमेगा।
एक दफ़े तपती धूप में अलवर की मीणा मास्टराणी गाँव की स्कूल में पढ़ाने आई लेकिन शहर से आवागमन नहीं होने पर गाँव में ही रुक गई।मैंने जब नये मुल्क़ में मन लगने का पूछा तो वह हँसकर कहने लगी कि" यहाँ के लोग गॉसिप ज़्यादा करते हैं और पकाते बहुत है।मेरे पापा बैंक ऑफीसर हैं, भैया-भाभी जयपुर रहते हैं,सब अपने में मग्न हैं, कोई चिंता नहीं।"
मैंने उनकी तुलना को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया लेकिन दो साल पश्चात् जब उनका ट्रांसफर किसी अन्य जगह हुआ तो विदा के वक़्त मैंने उन्हें दो सालों का अनुभव पूछा तो वे बच्चों के सामने ही कहने लगीं कि "रेगिस्तान में नया आदमी आते हुए भी रोता हुआ आता है और जाते हुए भी रोता हुआ विदा लेता है।" यह अवधारणा मास्टरणी जी कहाँ से लाए ख़बर नहीं लेकिन मेरी भाभू ने उन्हें छाछ की बोतल और दूध की केतली पहुंचाना कभी बंद नहीं किया।मैं जब घर को जाता तो कुछ वाक्य उनके मुंह से सुनता रहता "बहन जी को ग्वार की फली पहुंचानी है, बहन जी को सांगरी पहुंचानी है, बहन जी को सूखी काचरी पहुंचानी है।" मुझे आज उन मास्टरणी जी को कहने में कोई गुरेज़ नहीं कि बेशक हमारी गॉसिप यूँ ही बनी रहे ताकि रेगिस्ताँ की पावन तहज़ीब बनी रहे।इस तकनीकी के दौर में भी आदमी दूसरे आदमी से घंटों तक बतियाता रहे,आप अपनी भौतिक ज़रूरतों का नृत्य करना,हमारा रेगिस्ताँ रूड़ी रीतों को पालता हुआ अपणायतों का नृत्य रमेगा।
कोटड़ी कलरव-7
'कोटड़ी की शामें'
मेरे आगे का ओटा ढ़लते सूरज से ठंडा होता जाता और मेरे भीतर में बिछी जाजमें आगे के ओटे पर होती,ओटे पर मंद होती सूरज की रोशनी से आसमाँ की झीनापन धरती पर उतर आता और सांझ ठाँसों में छिपने का जतन करने लग जाती।ओटे की जाजम पर बैठे अनूपसिंघ और चनेसर खाँ अपनी-अपनी सिंझ्या सिमरने बैठ जाते।मेरी तहज़ीब को जानना हरेक हिंदूस्तानी के बस की बात नहीं है,मैंने उसी एक ओटे पर अनूपसिंघ के मुँह से ईसरदास के सोलह सजीवण,अष्ट पदवी और लाडूनाथ के दूहे सुने थे तो दूसरी तरफ़ चनेसर खाँ को गले का ताबीज़ चूमकर बैठे-बैठे जिलानी की नैमते अता करते देखा।
ओरण के घूमरे लेकर भादवे का हरी चरने गई एवड़ों का झुंड उछलता-कूदता अपने नन्हें मेमनों से मिलने को आतुर धोरों की ढ़ाळों में दौड़ता हुआ आता।गायें नाडी पर दो बार की प्यास भांजती सणतर सोनेला से राफें हरी किये, पूँछ से कुत उड़ाती चली आती गवाड़ी की ओर।साँझ का रेगिस्तान गवाड़ी की रोनकों में बसा करता है।वाहनों के रास्ते पर चित्र कोरते बच्चे, भेड़ों की मिमियाहट बिच मेमनों की उछलकूद,गायों के नाळ से उड़ी गोधूळी,धोरों की टूँख पर उठती ऊँडी हाकलें और कूकारियाँ,गायों के थनों से निकली धार का पीतल के बर्तन में पड़ने वाला श्वर और उसी श्वर को ताल मिलाकर झऊ-बऊ करते बच्चों की किलोळ गवाड़ी की रंगत में वह तान घोलती जिसमें कहीं भी निराशा और उदासीनता के श्वर नहीं होते।मेरे ओटे पर बुजुर्ग पाटी का जमावड़ा ठा अनूपसिंघ और चनेसर खाँ अपनी बंतळ में एक-दूसरे को 'बाह मांहझा
भाईया' के हूँकारे और बाकारे देते हुए कहते जाते वे बातें जो या तो पाक़ बोर्डर में घटी थी या इन्हीं धोरों में।घटनाएं बलवंत बाखासर की,घटनाएं फरारी और तार लांघने की, घटनाएं ओमपुरी की, घटनाएं लाला शकूर की,घटनाएं लालजी चहुआण की, घटनाएं,सरूपींग बईया की।चनेसर सुनाता रहता कुरान की वे आयतें जो उसे कंठस्थ थी, उनका संबंध जोड़ता चाँद से और अपनी नैमत अता करने मेरे ओटे पर बैठा-बैठा इंतज़ार करता आभै पर चाँद के उगने का।गवाड़ी में ब्यालू का कलेवा उतर आता और चनेसर के काचरों की चटनी से लेकर कच्ची टिंडों का साग उबाली छाछ के साथ थाली में सौगात पाता था।चनेसर पढ़ता जाता किस्से और मैं अनूपसिंघ की आँखों में घोलती जाती अपणायतों की कोर।रातों की ख़ामोशी में सबकुछ शांत हो जाता केवल एक मेरी ही आँखें बूढ़ी डोकरड़ी व आज के मासूमी ईमोजी के ज्यूँ देखती रहती घरों के आँगनों में थके करसों को, शांत हुए पंछियों को, सर सर करती खेजड़की को।सांझ का यह मीठापन उतरता जाता मुझमे,मैं सुबहों की रोनकें देखने उत्सुकता से तकती रहती ढाँणी की अबोली मासूमियत को।
ओरण के घूमरे लेकर भादवे का हरी चरने गई एवड़ों का झुंड उछलता-कूदता अपने नन्हें मेमनों से मिलने को आतुर धोरों की ढ़ाळों में दौड़ता हुआ आता।गायें नाडी पर दो बार की प्यास भांजती सणतर सोनेला से राफें हरी किये, पूँछ से कुत उड़ाती चली आती गवाड़ी की ओर।साँझ का रेगिस्तान गवाड़ी की रोनकों में बसा करता है।वाहनों के रास्ते पर चित्र कोरते बच्चे, भेड़ों की मिमियाहट बिच मेमनों की उछलकूद,गायों के नाळ से उड़ी गोधूळी,धोरों की टूँख पर उठती ऊँडी हाकलें और कूकारियाँ,गायों के थनों से निकली धार का पीतल के बर्तन में पड़ने वाला श्वर और उसी श्वर को ताल मिलाकर झऊ-बऊ करते बच्चों की किलोळ गवाड़ी की रंगत में वह तान घोलती जिसमें कहीं भी निराशा और उदासीनता के श्वर नहीं होते।मेरे ओटे पर बुजुर्ग पाटी का जमावड़ा ठा अनूपसिंघ और चनेसर खाँ अपनी बंतळ में एक-दूसरे को 'बाह मांहझा
भाईया' के हूँकारे और बाकारे देते हुए कहते जाते वे बातें जो या तो पाक़ बोर्डर में घटी थी या इन्हीं धोरों में।घटनाएं बलवंत बाखासर की,घटनाएं फरारी और तार लांघने की, घटनाएं ओमपुरी की, घटनाएं लाला शकूर की,घटनाएं लालजी चहुआण की, घटनाएं,सरूपींग बईया की।चनेसर सुनाता रहता कुरान की वे आयतें जो उसे कंठस्थ थी, उनका संबंध जोड़ता चाँद से और अपनी नैमत अता करने मेरे ओटे पर बैठा-बैठा इंतज़ार करता आभै पर चाँद के उगने का।गवाड़ी में ब्यालू का कलेवा उतर आता और चनेसर के काचरों की चटनी से लेकर कच्ची टिंडों का साग उबाली छाछ के साथ थाली में सौगात पाता था।चनेसर पढ़ता जाता किस्से और मैं अनूपसिंघ की आँखों में घोलती जाती अपणायतों की कोर।रातों की ख़ामोशी में सबकुछ शांत हो जाता केवल एक मेरी ही आँखें बूढ़ी डोकरड़ी व आज के मासूमी ईमोजी के ज्यूँ देखती रहती घरों के आँगनों में थके करसों को, शांत हुए पंछियों को, सर सर करती खेजड़की को।सांझ का यह मीठापन उतरता जाता मुझमे,मैं सुबहों की रोनकें देखने उत्सुकता से तकती रहती ढाँणी की अबोली मासूमियत को।
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